एनपीपीए ने प्रमुख कीमोथेरपी दवाओं की कीमतों में 50% की वृद्धि की

Rashtrabaan

    एक वरिष्ठ प्रतिनिधि ने सुझाव दिया है कि दवा के मूल्य निर्धारण में संशोधन को सक्रिय फार्मास्यूटिकल इंग्रीडिएंट्स (API) की लागत से जोड़ा जाना चाहिए ताकि दवाओं की आपूर्ति में कमी और बाजार में अस्थिरता से बचा जा सके। यह प्रस्ताव विशेष रूप से कीमोथेरपी दवाओं की कीमतों पर चर्चा के संदर्भ में आया है, जो कैंसर रोगियों के लिए अत्यंत आवश्यक हैं।

    प्रतिनिधि ने कहा कि वर्तमान में दवाओं की कीमतों में बार-बार बदलाव के पीछे मुख्य कारण कच्चे माल की कीमतों में उतार-चढ़ाव है। यदि दवा मूल्य में बदलाव का आधार स्पष्ट और समयसापेक्ष तरीके से API की लागत से जोड़ा जाए, तो इससे न केवल दवा निर्माताओं बल्कि उपभोक्ताओं और स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं को भी स्थिरता मिलेगी।

    कीमोथेरपी दवाओं की कीमतें विश्वभर में महंगी होती हैं, और भारत जैसे विकासशील देशों के लिए यह चुनौतीपूर्ण है कि वे इन उपचारों को अधिक से अधिक जरूरतमंद लोगों तक सुलभ बनाएं। आर्थिक दृष्टिकोण से यह प्रस्ताव एक समाधान प्रस्तुत करता है जिससे कीमतों में उचित पारदर्शिता आएगी और आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान कम होगा।

    इसके अलावा, Tata Memorial सेंटर के प्रतिनिधि ने यह भी बताया कि यदि दवाओं की कीमत निर्धारण प्रणाली API लागत से लिंक होगी, तो यह दवा निर्माताओं के लिए आपूर्ति की स्थिरता बनाए रखने में मददगार होगी। वह कहते हैं कि इससे आपूर्ति बंद होने के खतरे को कम किया जा सकेगा, जो कई बार कीमतों के असंगत उतार-चढ़ाव के कारण होता है।

    स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह का कदम रोगियों के लिए दवाओं की उपलब्धता और किफायतीपन दोनों के लिए सकारात्मक साबित होगा। भारत में NPPP (नेशनल फार्मास्यूटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी) पहले भी कीमोथेरपी दवाओं की कीमतों को लेकर कई बार संशोधन करता रहा है, लेकिन API लागत से स्पष्ट लिंक न होने के कारण दवा की लागत में अप्रत्याशित वृद्धि या कमी होती रही है।

    इस घोषणा से दवा निर्माताओं, अस्पतालों और सरकारी एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय की संभावना बढ़ेगी, जिससे अंततः कैंसर जैसे गंभीर रोगों के इलाज में सुधार होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यह पहल भारतीय दवा बाजार की पारदर्शिता और मजबूती की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है।

    इस संदर्भ में, विभिन्न हितधारकों ने भी आपूर्ति स्थिरता बनाये रखने की आवश्यकता पर सहमति जताई है। उनका कहना है कि दवाओं की बढ़ती कीमतों से न केवल रोगियों को भारी आर्थिक बोझ का सामना करना पड़ता है, बल्कि यह रोगियों के इलाज के समय और गुणवत्ता पर भी असर डालता है।

    अंततः, यह सुझाव सरकार के लिए एक संकेत के रूप में काम कर सकता है कि दवा मूल्य निर्धारण में समग्र और व्यवहार्य सुधार की आवश्यकता है, जिससे चिकित्सा क्षेत्र की स्थिरता और रोगियों की भलाई सुनिश्चित की जा सके। ऐसे कदमों से स्वास्थ्य सेवा व्यवस्था में और सुधार की उम्मीद की जा रही है।

    Source

    error: Content is protected !!