छिंदवाड़ा। देश के तीन राज्यों में भारतीय जनता पार्टी की बढ़त और जीत ने कार्यकर्ताओं में जोश तो भरा, लेकिन छिंदवाड़ा में यह जोश एकजुटता के बजाय गुटबाजी के रंग में रंगा नजर आया। भाजपा जिलाध्यक्ष शेषराव यादव के नेतृत्व में पार्टी कार्यालय में मुख्य कार्यक्रम आयोजित किया गया, जहाँ आतिशबाजी और मिठाइयों के साथ जीत का जश्न मनाया गया। संगठन के नजरिए से यह आधिकारिक कार्यक्रम था, लेकिन इस दौरान सांसद खेमे की दूरी चर्चा का विषय बनी रही।
दूसरी ओर, सांसद बंटी विवेक साहू के समर्थकों ने सांसद कार्यालय में एक अलग कार्यक्रम आयोजित किया। मजे की बात यह है कि इस कार्यक्रम का आधार केवल पार्टी की जीत नहीं, बल्कि सांसद की निजी उपलब्धि को बनाया गया। सांसद कार्यालय से मीडिया को बाकायदा मेल भेजकर यह जानकारी साझा की गई कि असम चुनाव में बंटी विवेक साहू को जिन 6 सीटों की जिम्मेदारी सौंपी गई थी, वहां भाजपा प्रत्याशी प्रचंड मतों से जीत रहे हैं। समर्थकों ने इसे सांसद बंटी विवेक साहू की मेहनत का रंग करार दिया। हालांकि सांसद बंटी विवेक साहू अपने कार्यालय में उपस्थित नहीं थे, बताया जा रहा है वह किसी विवाह कार्यक्रम में पहुंचे थे।
छिंदवाड़ा भाजपा की यह तस्वीर आने वाले समय में जिले की राजनीति के लिए बड़े संकेत दे रही है। यदि जीत के समय भी पार्टी एक नहीं हो सकती, तो आगामी चुनौतियों में यह बिखराव संगठन को भारी पड़ सकता है। फिलहाल, जनता और राजनीतिक पंडित यही पूछ रहे हैं कि ये जश्न जीत का है या अपनी-अपनी जमीन बचाने का?
पीठ थपथपाने की राजनीति पर उठे सवाल
राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज है कि जब पूरी पार्टी तीन राज्यों की बम्पर जीत का उत्सव मना रही है, तब बंटी विवेक साहू केवल अपनी प्रभार वाली सीटों का श्रेय लेने में जुटे हैं। आलोचकों का कहना है कि सांसद को पार्टी की सामूहिक जीत से ज्यादा अपनी ब्रांडिंग की चिंता है। भाजपा के पुराने कार्यकर्ताओं के बीच यह चर्चा का विषय है कि क्या व्यक्तिगत उपलब्धियां संगठन के अनुशासन से ऊपर हो गई हैं?
सार्वजनिक हुई अंदरूनी कलह
वैसे तो ऐसी बड़ी जीत पर सभी कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों को एक ही झंडे के नीचे, एक ही स्थान पर एकत्रित होकर जश्न मनाना चाहिए था। लेकिन छिंदवाड़ा में भाजपा कार्यालय और सांसद कार्यालय के बीच खिंची यह लकीर बताती है कि भीतर ही भीतर मतभेदों की खाई कितनी गहरी हो चुकी है। अलग-अलग जश्न मनाकर दोनों गुटों ने अपनी अंदरूनी लड़ाई को सार्वजनिक मंच पर ला खड़ा किया है, जिससे आम जनता और विपक्षी दलों को चुटकी लेने का मौका मिल गया है।
कार्यकर्ताओं में असमंजस की स्थिति
नेताओं की इस नूराकुश्ती का सबसे बुरा असर जमीनी कार्यकर्ताओं पर पड़ रहा है। कार्यकर्ता इस दुविधा में दिखे कि वे संगठन के साथ खड़ें हों या सांसद के शक्ति प्रदर्शन का हिस्सा बनें। इस घटनाक्रम ने यह स्पष्ट कर दिया है कि छिंदवाड़ा भाजपा में अब वर्चस्व की लड़ाई किसी बंद कमरे की बात नहीं रह गई है, बल्कि यह अब खुलेआम सड़कों पर लड़ी जा रही है।
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