बालाघाट। 21 अप्रैल से 28 अप्रैल के बीच कान्हा टाइगर रिजर्व से जो खबरें आईं, उन्होंने वन्यजीव प्रेमियों का दिल दहला दिया। पहले एक-एक कर शावक मरे और फिर उनकी माँ (बाघिन T-141 अमाही) ने भी दम तोड़ दिया। कांग्रेस नेता मनीष कुशवाहा का आरोप है कि जब पहले तीन शावकों की मौत हुई, तब भी वन अमला गहरी नींद में था। बाघिन और आखिरी शावक को तब क्वारंटाइन किया गया जब पानी सिर के ऊपर से गुजर चुका था। कांग्रेस का कहना है कि यह इलाज नहीं, बल्कि विभाग की निगरानी में मौत का इंतजार था।
वन विभाग जहाँ इस मौतों के पीछे ‘फेफड़ों के संक्रमण’ और ‘कैनाइन डिस्टेंपर वायरस’ का तर्क दे रहा है, वहीं बैहर विधायक संजय उइके के दावों ने विभाग की पोल खोल कर रख दी है। विधायक के मुताबिक, पोस्टमार्टम रिपोर्ट में दो शावकों के पेट पूरी तरह खाली मिले हैं, जो चीख-चीख कर कह रहे हैं कि बाघों की मौत बीमारी से नहीं बल्कि ‘भूख’ से हुई है। क्या दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित टाइगर रिजर्व में बाघों को भोजन नसीब नहीं हो रहा? यह सवाल आज पूरी सरकार को चुभ रहा है।
वैक्सीनेशन में लापरवाही, गिर जैसी त्रासदी की ओर कान्हा
मनीष कुशवाहा ने तकनीकी खामियों पर प्रहार करते हुए कहा कि एनटीसीए के स्पष्ट निर्देश हैं कि टाइगर रिजर्व के 5 किमी के दायरे में आने वाले पालतू कुत्तों का टीकाकरण अनिवार्य है ताकि सीडीव्ही जैसा घातक वायरस जंगल में न फैले। लेकिन कान्हा प्रबंधन इस मोर्चे पर पूरी तरह फेल रहा। विभाग के अफसर वन्यप्राणियों को बचाने के बजाय मैनेजमेंट इवेंट्स और वीआईपी संस्कृति में मशगूल हैं। 2018 में गिर के जंगलों में 30 शेरों की मौत सीडीव्ही से हुई थी, कांग्रेस का आरोप है कि लापरवाही के चलते कान्हा भी उसी राह पर बढ़ रहा है।
आंकड़ों में टाइगर स्टेट की शर्मिंदगी
मध्य प्रदेश 785 बाघों के साथ देश का नंबर वन टाइगर स्टेट है, लेकिन सुरक्षा के मामले में फिसड्डी साबित हो रहा है। मनीष कुशवाहा ने आंकड़े रखते हुए बताया कि इस साल 7 जनवरी से अब तक प्रदेश में 27 बाघों की मौत हो चुकी है। अकेले अप्रैल महीने में कान्हा ने 7 बाघ खो दिए हैं। ढिगडोला जैसे चर्चित बाघों की संदिग्ध मौतें बताती हैं कि वन विभाग बेजुबान वन्यजीवों की सुरक्षा करने में अक्षम साबित हो रहा है।
पर्यटन और रोजगार पर मंडराता खतरा
कांग्रेस ने इस मुद्दे को स्थानीय अर्थव्यवस्था से भी जोड़ा है। कान्हा नेशनल पार्क से हजारों परिवारों की रोजी-रोटी जुड़ी है। मनीष कुशवाहा के अनुसार, अगर बाघ नहीं बचेंगे, तो पर्यटक नहीं आएंगे। पर्यटक नहीं आएंगे, तो गाइड, जिप्सी चालक और होटल कर्मियों के सामने भुखमरी की स्थिति पैदा हो जाएगी। बाघों का संरक्षण केवल पर्यावरण नहीं, बल्कि स्थानीय रोजगार की सुरक्षा भी है।
भाजपा सरकार से तीखे सवाल
मनीष कुशवाहा ने सीधे मुख्यमंत्री और वन मंत्री से सवाल पूछा है कि आखिर मध्य प्रदेश बाघों की सुरक्षा में बार-बार फेल क्यों हो रहा है? क्या अफसरों की फाइलें बाघों की जान से ज्यादा कीमती हैं? कांग्रेस की इस तेजतर्रार घेराबंदी ने प्रशासन को बैकफुट पर ला दिया है। टाइगर बचाओ, जंगल बचाओ, रोजगार बचाओ के नारे के साथ अब यह लड़ाई सड़कों पर उतरने को तैयार है। यदि 7 दिन में ठोस कार्रवाई नहीं होती, तो कान्हा के गेट पर होने वाला धरना सरकार की मुश्किलों को और बढ़ा सकता है।

