अरुण राय और कमल मानाठाकुर के बीच शराब सिंडिकेट की चर्चा तेज, क्या जाँच की आंच तक पहुँचेंगे ठेकेदार?

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  • शराब के सम्राट के आगे आबकारी विभाग पंगु : शराब माफिया के हौसले बुलंद: गांव-गांव पहुँच रही अवैध शराब की खेप

    सिवनी। जिले में आबकारी विभाग की कार्यप्रणाली पर गहरा प्रश्नचिह्न लग गया है। जहाँ एक ओर विभाग सुस्ती की चादर ओढ़े बैठा है, वहीं दूसरी ओर शराब ठेकेदार नियमों को ताक पर रखकर पूरे जिले को नशे की गर्त में धकेल रहे हैं। सिवनी में आबकारी विभाग पूरी तरह पंगु नजर आ रहा है, जिसका सीधा फायदा उठाकर शराब ठेकेदार पैकारी के माध्यम से गांव-गांव में अवैध शराब की आपूर्ति कर रहे हैं। हाल ही में सिवनी कोतवाली पुलिस द्वारा पकड़ी गई अवैध शराब की बड़ी खेप ने यह स्पष्ट कर दिया है कि आबकारी विभाग की नाक के नीचे अवैध कारोबार का समांतर साम्राज्य चल रहा है।

    विगत दिनों सिवनी कोतवाली पुलिस ने मुस्तैदी दिखाते हुए अवैध शराब की एक बड़ी खेप बरामद की थी। पुलिस की इस सफलता ने जहाँ विभाग की पीठ थपथपाई है, वहीं आबकारी विभाग की लचर और संदेहास्पद भूमिका को उजागर कर दिया है। सूत्रों की मानें तो पकड़ी गई शराब की यह खेप चर्चित नाम अरुण राय की थी, जिसे कमल मानाठाकुर को अवैध रूप से बिक्री के लिए भेजा गया था। फिलहाल यह पूरा मामला पुलिस की विवेचना के दायरे में है। जानकारों का कहना है कि यदि पुलिस जाँच का दायरा बढ़ाती है और शराब के बैच नंबर व स्टॉक की कड़ियाँ जोड़ती है, तो यह सफेदपोश ठेकेदार बेनकाब हो सकते हैं।

    महीना बंदी और रसूख का खेल?

    आखिर क्यों आबकारी विभाग इन बड़े खिलाड़ियों पर हाथ डालने से कतरा रहा है? सूत्रों का दावा है कि इस सन्नाटे और सुस्ती के पीछे महीना बंदी (रिश्वत का मासिक फिक्स खेल) एक बड़ी वजह है। आरोप लग रहे हैं कि आबकारी विभाग के कुछ जिम्मेदार अधिकारियों ने शराब माफियाओं से सांठगांठ कर ली है, जिसके बदले विभाग अपनी आँखें मूंदकर बैठा है। यही कारण है कि जब पुलिस अवैध शराब पकड़ती है, तो विभाग केवल कागजी खानापूर्ति कर अपना पल्ला झाड़ लेता है।

    पैकारी, गांव की शांति पर माफिया का प्रहार

    शराब ठेकेदारों का पुराना हथियार है पैकारी। आधिकारिक दुकानों के अलावा, गांव के किराना दुकानों, ढाबों और घरों से शराब बिकवाई जा रही है। इससे न केवल शासन को राजस्व का चूना लग रहा है, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में अपराध और पारिवारिक कलह का ग्राफ भी बढ़ रहा है। ठेकेदार अपनी सेल बढ़ाने के लिए अवैध माध्यमों से शराब की नदियाँ बहा रहे हैं, और आबकारी अमला दफ्तरों तक ही सीमित है।
    सवाल यह उठता है कि क्या आबकारी विभाग केवल लाइसेंस फीस वसूलने तक ही सीमित है? अगर पुलिस अवैध शराब पकड़ सकती है, तो विभाग का मुखबिर तंत्र और फ्लाइंग स्क्वाड कहाँ गायब है?

    कलेक्टर से सख्त कार्रवाई की उम्मीद

    सिवनी की जनता अब जिला प्रशासन और विशेषकर कलेक्टर से हस्तक्षेप की उम्मीद कर रही है। पुलिस की प्राथमिक जाँच में जिन नामों (अरुण राय और कमल मानाठाकुर) का जिक्र सूत्रों द्वारा किया जा रहा है, उनकी गहनता से पड़ताल होनी आवश्यक है। सिवनी में अवैध शराब का यह खेल केवल दो व्यक्तियों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक गहरी साजिश है जो सिस्टम को खोखला कर रही है। यदि समय रहते इन शराब सम्राटों पर नकेल नहीं कसी गई और आबकारी विभाग की जवाबदेही तय नहीं हुई, तो जिले में कानून-व्यवस्था की स्थिति और अधिक बिगड़ सकती है। अब देखना यह है कि क्या पुलिस इस जाँच को अंजाम तक पहुँचाती है या माफिया का रसूख एक बार फिर भारी पड़ेगा।

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