अंगारा: तटीय कर्नाटक में सांस्कृतिक गौरव के परतों के नीचे सामाजिक बहिष्कार का खुलासा

Rashtrabaan

    अभिनव ग्रोव द्वारा निर्देशित नाटक “अंगारा” ने बेंगलुरु में आयोजित चिगुरु और कुसुमले थिएटर फेस्टिवल के हिस्से के रूप में मंच पर अपनी प्रस्तुति दी। यह नाटक तटीय कर्नाटक के सांस्कृतिक गौरव के पीछे छिपे सामाजिक बहिष्कार की गंभीर समस्या को उजागर करता है।

    नाटक की कहानी स्थानीय जीवन के मार्मिक पहलुओं को दर्शाती है, जिसमें जातिगत और सामाजिक भेदभाव के कारण उत्पन्न विरोधाभास और विभाजन को बारीकी से दिखाया गया है। “अंगारा” की प्रस्तुति ने दर्शकों को यह सोचने पर मजबूर किया कि कैसे सामाजिक बहिष्कार हमारे समाज में गहरे जड़ें जमा चुके हैं, जो अक्सर सांस्कृतिक पहचान के गर्व के पर्दे के पीछे छिपे रहते हैं।

    अभिनव ग्रोव का निर्देशन नाटक को ज़िंदगी से भरपूर और संवेदनशील बनाता है। मंच सज्जा, संवाद, और कलाकारों की अभिव्यक्ति ने कहानी को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया। नाटक में सामाजिक बहिष्कार के विभिन्न पहलुओं का विश्लेषण करते हुए, वह दर्शकों को समावेशी समाज के महत्व की याद दिलाता है।

    इस नाटक ने न केवल कला प्रेमियों बल्कि सामाजिक कार्यकर्ताओं और चिंतकों का भी ध्यान आकर्षित किया है। मंचन के बाद कई दर्शकों ने इस विषय पर खुलकर चर्चा की, जो ज़ाहिर करता है कि “अंगारा” ने विशिष्ट सामाजिक मुद्दे को उजागर करने में सफलता प्राप्त की है।

    चिगुरु और कुसुमले थिएटर फेस्टिवल, जो विभिन्न प्रकार के सांस्कृतिक और सामाजिक मुद्दों पर आधारित नाटकों को प्रोत्साहित करता है, ने इस तरह के मंचन के माध्यम से समाज में जागरूकता फैलाने का कार्य जारी रखा है। “अंगारा” इस प्रयास की एक महत्वपूर्ण कड़ी साबित हुआ है, जिसने सामाजिक समानता और सहिष्णुता के संदेश को मजबूती से परोसा है।

    इस नाटक की सफल प्रस्तुति से यह स्पष्ट होता है कि कला समाज के ज्वलंत मुद्दों को सामने लाने का एक प्रभावशाली माध्यम है, जो लोगों को सोचने, बोलने और बदलाव की दिशा में कदम बढ़ाने के लिए प्रेरित करता है।

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