अहम प्रवाहिनी: भरतनाट्यम के माध्यम से नदी की यात्रा की छानबीन

Rashtrabaan

    शोभना भालचंद्रा द्वारा निर्मित और निर्देशित नृत्य नाटक ‘अहम प्रवाहिनी’ ने हाल ही में चेन्नई के कलाक्षेत्र में अपनी प्रस्तुति से दर्शकों का मन मोह लिया। इस प्रस्तुति में भरतनाट्यम नृत्य के माध्यम से नदी की यात्रा और उसके प्रवाह की कथा बेहद मार्मिक ढंग से प्रस्तुत की गई।

    ‘अहम प्रवाहिनी’ शाब्दिक अर्थ में ‘मैं एक प्रवाहिनी हूँ’ है, जो न केवल नदी के बहने की प्रक्रिया को दर्शाता है, बल्कि यह मानव जीवन के प्रवाह और उसके अनुभवों से भी गहरा संबंध जोड़ता है। शोभना भालचंद्रा ने इस नृत्य नाटक के जरिए प्रकृति, जीवन और कला के अद्भुत संगम को अभिव्यक्त किया है।

    कलाक्षेत्र की प्राचीन पुण्यभूमि में इस नाटक का मंचन देखने के लिए कला प्रेमी बड़ी संख्या में उपस्थित हुए। दर्शकों ने शामिल होकर भरतनाट्यम के शास्त्रीय मानों में नदी की यात्रा, उसके उतार-चढ़ाव, और उसकी समृद्धि की झलक को समान रूप से सराहा। नृत्यांगना के सशक्त भाव-भंगिमाओं ने दर्शकों को बिना शब्दों के एक गहरा अनुभव दिया, जो पारंपरिक भारतीय नृत्य की श्रेष्ठता को श्रद्धांजलि देता है।

    इस प्रस्तुति में संगीत एवं दूरदर्शी मंच निर्देशन ने नाटकीयता को और उभार दिया। मृदंग, तबला, और वीणा जैसे शास्त्रीय वाद्य यंत्रों की मधुर धुनें नृत्य के भाव को और प्रभावी बनाती हैं। साथ ही, रंगों और प्रकाश व्यवस्था का संयोजन नाटकीय भावनाओं को जीवंत बना रहा है।

    शोभना भालचंद्रा ने इस नाटक के माध्यम से यह संदेश देने का प्रयास किया है कि जैसे नदी अपने मार्ग में कई बाधाएं पार करती है, वैसे ही मानव जीवन में भी उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। यह नदी न केवल अपनी मंजिल की ओर अग्रसर होती है, बल्कि रास्ते में मिलने वाले संसाधनों और अनुभवों से भी समृद्ध होती है।

    भरतनाट्यम की इस प्रस्तुति से यह साबित होता है कि भारतीय शास्त्रीय नृत्य केवल कला का माध्यम नहीं, अपितु जीवन की विभिन्न कथाओं, समाज के संदेशों और आध्यात्मिक मार्गदर्शन का संवेदनशील व्यंजक भी हो सकता है। ‘अहम प्रवाहिनी’ कला के विश्व में एक नई मिसाल प्रस्तुत करता है, जो कलाकारों और दर्शकों दोनों के लिए एक प्रेरणा का स्रोत है।

    कुल मिलाकर, ‘अहम प्रवाहिनी’ न केवल नृत्य प्रेमियों के लिए बल्कि समस्त भारतीय सांस्कृतिक विरासत के लिए गर्व का विषय है। यह नाटक भारतीय लोक संस्कृति और शास्त्रीय कला के बीच की खूबसूरत कड़ी को दर्शाता है और आने वाले समय में इसके प्रभावशाली मंचन की उम्मीद की जा रही है।

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