पाकिस्तान का लाहौर बना दुनिया का सबसे प्रदूषित शहर, AQI 530 के पार; जहरीली हवा से स्वास्थ्य पर बढ़ा खतरा

Rashtrabaan News Desk
Highlights
  • लाहौर में पीएम 2.5 का स्तर 343 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर पहुंचा, कई पाकिस्तानी शहर भी प्रदूषण की चपेट में
  • प्रदूषण से पाकिस्तान में हर साल करीब 1.28 लाख लोगों की अकाल मौत, जीवन प्रत्याशा में 3.9 साल तक की कमी

    इस्लामाबाद, राष्ट्रबाण। पाकिस्तान का सांस्कृतिक हृदय कहे जाने वाला लाहौर शहर वायु प्रदूषण के मामले में दुनिया भर में शीर्ष पर पहुंच गया है, जहां सोमवार को वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) खतरनाक स्तर को पार करते हुए 530 के आंकड़े को लांघ गया। हवा में मौजूद जानलेवा बारीक कणों (पीएम 2.5) की सांद्रता 343 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर तक दर्ज की गई, जो मानव स्वास्थ्य के लिए अत्यंत घातक मानी जाती है। वैश्विक वायु गुणवत्ता रैंकिंग के अनुसार, इस सूची में लाहौर के बाद मिस्र की राजधानी काहिरा का स्थान रहा, जिसका एक्यूआई 226 दर्ज किया गया। लाहौर के अलावा पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के अन्य शहर भी अत्यधिक प्रदूषण की चपेट में हैं, जिनमें गुजरांवाला (475 एक्यूआई), फैसलाबाद (435 एक्यूआई), मुल्तान (280 एक्यूआई), सियालकोट (241 एक्यूआई) और बहावलपुर (180 एक्यूआई) जैसे शहरी केंद्र शामिल हैं। सर्दियों के मौसम की शुरुआत के साथ ही पराली जलाने की घटनाओं में तेजी और भौगोलिक परिस्थितियों के चलते इस क्षेत्र में हवा की गुणवत्ता लगातार बद से बदतर होती जा रही है।
    विशेषज्ञों और शोध रिपोर्टों के अनुसार, यह गंभीर प्रदूषण पाकिस्तान के सार्वजनिक स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था पर भारी पड़ रहा है। देश में वायु प्रदूषण के कारण औसत जीवन प्रत्याशा में करीब 3.9 वर्ष की कमी आ रही है और यह हर साल लगभग 1,28,000 अकाल मौतों का मुख्य कारण बन रहा है। लाहौर जैसे अत्यधिक प्रभावित शहरों में लंबे समय तक इस जहरीली हवा में सांस लेने से नागरिकों की जीवन प्रत्याशा सात साल तक घट सकती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा निर्धारित पांच माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर के वार्षिक सुरक्षित दिशानिर्देश की तुलना में लाहौर में पीएम 2.5 का वार्षिक औसत स्तर 22 गुना से भी अधिक पाया गया है, जो एक भयावह स्थिति को दर्शाता है। अध्ययन बताते हैं कि इस भारी प्रदूषण के प्राथमिक स्रोतों में वाहनों से होने वाला धुआं शीर्ष पर है, जबकि उद्योगों का योगदान 28 प्रतिशत और ईंट भट्टों का योगदान 17 प्रतिशत है। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए पर्यावरणविदों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने सरकार से तत्काल और कड़े नीतिगत कदम उठाने की मांग की है ताकि इस बढ़ते पर्यावरणीय और मानवीय संकट से निपटा जा सके।

    error: Content is protected !!