82 वर्षीया सुदरानी राघुपथी समझाती हैं कि एआई कभी क्या नहीं कर पाएगा

Rashtrabaan

    भारतीय शास्त्रीय नृत्य की प्रख्यात नर्तकी सुदरानी राघुपथी ने हाल ही में तकनीकी प्रगति, कलात्मक प्रयोगों और सामाजिक बदलावों पर अपनी गहरी विरामशैली साझा की। 82 वर्ष की उम्र में भी उनकी दृष्टि और समझ में समय के साथ हुए बदलावों का अनूठा समावेश देखने को मिलता है।

    सुदरानी राघुपथी ने कहा कि जबकि आधुनिक तकनीक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ने अनेक क्षेत्रों में क्रांति ला दी है, कला के क्षेत्र में इसका स्थान सीमित है। उनका मानना है कि कलाकारों की अनुकूलता, उनकी सजीव improvisation और भावों की गहराई ऐसी क्षमताएं हैं, जिन्हें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस कभी भी पूरी तरह नहीं समझ या दोहरा पाएगा।

    उन्होंने बताया कि कला केवल तकनीक का प्रदर्शन नहीं बल्कि एक भावनात्मक और सांस्कृतिक अनुभव है, जो कलाकार और दर्शक के बीच एक अनोखे संवाद को जन्म देता है। इस संवाद में दर्शकों की स्वीकृति और उनकी संवेदनशीलता बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। सुदरानी जी ने यह भी स्पष्ट किया कि भारतीय सामाजिक संरचना में जाति या सामाजिक लेबल पर आधारित पूर्वाग्रह आज की कला को सीमित नहीं कर सकते, क्योंकि असली कला उन सभी बंधनों से ऊपर है।

    उनका मानना है कि युवा कलाकारों को न केवल अपनी पारंपरिक जड़ों के साथ जुड़े रहना चाहिए बल्कि नए प्रयोगों और सोच को भी अपनाना चाहिए ताकि कला समय के साथ विकसित हो सके। सुदरानी राघुपथी का कहना था कि सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म ने कलाकारों के लिए नई संभावनाएं खोली हैं, लेकिन असली कला की परीक्षा हमेशा लाइव प्रस्तुति और दर्शकों की प्रतिक्रिया से होती है।

    संपूर्ण बातचीत में सुदरानी जी ने स्पष्ट किया कि तकनीक जितनी भी उन्नत हो जाए, आलोकित और प्रेरित मानव मन की अभिव्यक्ति की जगह कभी नहीं ले सकती। इस दृष्टिकोण से वे कलाकारों को लगातार अपने स्वरूप और शैली में नवाचार करने, दर्शकों के साथ बेहतर संबंध बनाने तथा अपनी सांस्कृतिक विरासत को आगे ले जाने के लिए प्रोत्साहित करती हैं।

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