भारत में इस वर्ष के मानसून का अत्यंत कमतर रिकार्ड दर्ज किया गया है, जिसमें जून माह के लिए 43% की भारी कमी देखी जा रही है। इस कमी का सीधा असर देश की कृषि उत्पादन चक्र पर पड़ा है, खासकर खरीफ फसलों के लिए यह स्थिति अति गंभीर हो गई है। किसानों की आय और देश की खाद्य सुरक्षा के लिहाज से यह संकट काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
मानसून की असामान्य गिरी और कमी के कारण अलग-अलग राज्यों में कृषि क्षेत्र की संवेदनशीलता में भिन्नता देखी गई है। यह कमी न केवल क्षेत्रीय स्तर पर बल्कि फसल-विशेष के हिसाब से भी विभाजित है, जिससे कुछ फसलों की पैदावार पर विशेष प्रभाव पड़ा है। उदाहरण के लिए, धान, बाजरा, और मक्का जैसी खरीफ फसलों की बुवाई प्रभावित हुई है जिसके कारण संभावित उत्पादन में कमी का अंदेशा व्यक्त किया जा रहा है।
राज्यों के स्तर पर, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, और राजस्थान जैसे प्रमुख कृषि उत्पादक राज्यों में मानसून की कमी फसलों के विकास के लिए चुनौतीपूर्ण साबित हो रही है। इससे इलाके विशेष में सिंचाई की आवश्यकता बढ़ी है। सिंचाई व्यवस्था के अभाव में किसान प्रभावित हुए और इससे खाद्यान्न उत्पादन में गिरावट का खतरा मंडराने लगा है। सरकार द्वारा संचालित मौसम विभाग और कृषि मंत्रालय ने इस संदर्भ में सजगता बरतते हुए राहत उपायों पर भी जोर दिया है।
इसके अतिरिक्त, कृषि विशेषज्ञों एवं मौसम विज्ञानीओं ने इस वर्ष के मानसून के प्रति किसानों को सावधानी बरतने तथा जल संरक्षण और सिंचाई प्रबंधन की दिशा में कड़ा ध्यान देने का सुझाव दिया है। साथ ही फसल विविधता लाने एवं सूखे का मुकाबला करने वाली तकनीकों को अपनाने की सलाह दी जा रही है जिससे किसान संकट के समय बेहतर निर्णय ले सकें।
इस प्रकार, वर्ष 2024 के खरीफ मौसम में मानसून की कमी ने भारत की कृषि व्यवस्था पराकाष्ठा की संवेदनशीलता उभार कर रख दी है। यह आवश्यक है कि संबंधित विभाग और किसान मिलकर परिस्थिति का सामना करें और उपयुक्त कदम उठाएं ताकि खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके और आर्थिक नुकसान कम से कम हो।

