फिल्मकार और पटकथा लेखक ने 1990 के दशक की शुरुआत की पृष्ठभूमि को बहुत गंभीरता से लिया है, जिससे फिल्म की रचना और निर्देशन में उस दौर की झलक साफ तौर पर दिखती है। यह ऐतिहासिक सेटिंग फिल्म के हर पहलू में झलकती है, लेकिन इसके कारण कहानी को आधुनिकता और नवीनता की कमी का सामना करना पड़ता है।
फिल्म की पटकथा में उस समय की राजनीति की जटिलताओं को दर्शाने की इच्छा स्पष्ट है, लेकिन परिणाम ऐसा प्रतीत होता है जैसे फिल्म 1990 के दशक के राजनीतिक थियेटर का एक पुराना संस्करण हो। संवाद और घटनाक्रम में नयापन नहीं दिखता, जिससे फिल्म कहीं न कहीं फीकी और पिछड़ी सी लगती है।
यह बात स्वीकार करनी होगी कि उस दशक की राजनीति के रंग-रूप और वातावरण को सजीव रूप में पिरोना बड़ा चुनौतीपूर्ण कार्य है। हालांकि, फिल्मकार ने अपनी परंपरागत शैली में ही काम किया है, जो आज के दर्शकों के लिए पुरानी और उबाऊ साबित हो सकती है।
निर्देशन में भी नई तकनीकों और समकालीन सिनेमाई प्रवृत्तियों की कमी महसूस होती है। फिल्म का निर्माण और छायांकन भी उस दौर की ही याद दिलाता है, जो आधुनिक सिनेमा के लिहाज से कमतर लगता है। इस तरह से सेट और प्रॉप्स का चयन तो तारीफ के योग्य है, लेकिन फिल्म के फ्लो को प्रभावित करता है।
फिल्म की कहानी में वह जुनून और दिलचस्पी नहीं है जो दर्शक को बांध सके, बल्कि यह राजनीतिक घटनाओं के दोहराव जैसा प्रतीत होती है। दर्शकों को उस युग की राजनीति को समझाने की कोशिश करते हुए भी फिल्म उनकी अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतर पाती।
संक्षेप में कहा जाए तो ‘अनंथन काडु’ एक ऐसी फिल्म है जो अपने समय के राजनीतिक संदर्भों में सटीक बैठती है, लेकिन कथा और निष्पादन के महत्त्वपूर्ण पहलुओं में पिछड़ जाती है। यह फिल्म उन दर्शकों के लिए उपयुक्त हो सकती है जो 1990 के दशक के राजनीतिक नाटकों में दिलचस्पी रखते हैं, लेकिन सामान्य दर्शकों के लिए यह एक पुरानी सोच की कहानी से ज्यादा कुछ नहीं है।

