दो से ज्यादा बच्चे होने पर चुनाव लड़ने की पाबंदी पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा रुख, 23 साल पुराने फैसले की होगी समीक्षा

Rashtrabaan News Desk
Highlights
  • घटती प्रजनन दर को देखते हुए दो बच्चों की अनिवार्यता वाले कानूनों पर नए सिरे से विचार करने की जरूरत
  • महाराष्ट्र की पूर्व सरपंच को राहत, तीसरे बच्चे के जन्म के आधार पर अयोग्यता का आदेश रद्द

    नई दिल्ली, राष्ट्रबाण। स्थानीय निकाय चुनावों में दो से अधिक बच्चे होने पर उम्मीदवारों को अयोग्य ठहराने वाले कानूनों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि देश में बदलती जनसांख्यिकीय परिस्थितियों और लगातार घटती प्रजनन दर को देखते हुए ऐसे कानूनों के पीछे का औचित्य अब नए सिरे से परखने की जरूरत है। कोर्ट ने इस मुद्दे पर विचार के लिए 2003 के जावेद बनाम हरियाणा राज्य मामले को बड़ी पीठ के पास भेज दिया है।

    बड़ी पीठ करेगी कानून की प्रासंगिकता पर विचार

    जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने कहा कि भारत में प्रजनन दर में लगातार गिरावट आ रही है। ऐसे में दो से अधिक बच्चे होने के आधार पर लोगों को स्थानीय निकाय चुनाव लड़ने से रोकने वाले कानूनों की वर्तमान परिस्थितियों में प्रासंगिकता पर विचार किया जाना चाहिए। दरअसल, जावेद बनाम हरियाणा राज्य मामले में वर्ष 2003 में सुप्रीम कोर्ट की तीन न्यायाधीशों की पीठ ने हरियाणा पंचायती राज अधिनियम, 1994 के उस प्रावधान की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा था, जिसके तहत दो से अधिक जीवित बच्चे होने पर व्यक्ति को पंचायत चुनाव लड़ने से अयोग्य घोषित किया जाता था। अब इस फैसले से जुड़े कानूनी सवालों पर बड़ी पीठ विचार करेगी।

    महाराष्ट्र की पूर्व सरपंच को मिली राहत

    इसी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र ग्राम पंचायत अधिनियम, 1959 की धारा 14(1)(j-1) के तहत काकोडा ग्राम पंचायत की पूर्व सरपंच मंगला भीमराव को अयोग्य ठहराने का आदेश भी रद्द कर दिया। उन्हें तीसरे बच्चे के जन्म के आधार पर चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य घोषित किया गया था। महाराष्ट्र में 13 सितंबर 2000 से लागू संशोधन के तहत दो से अधिक बच्चे होने पर स्थानीय निकाय चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगाया गया था। इसी प्रावधान के आधार पर मंगला भीमराव के खिलाफ कार्रवाई की गई थी।

    बदलती परिस्थितियों में कानूनों की समीक्षा जरूरी

    सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी के बाद स्थानीय निकाय चुनावों में दो बच्चों की सीमा लागू करने वाले कानूनों की प्रासंगिकता पर नई बहस शुरू होने की संभावना है। अदालत ने बदलती जनसांख्यिकीय परिस्थितियों और घटती प्रजनन दर को ध्यान में रखते हुए इन प्रावधानों पर पुनर्विचार की जरूरत बताई है। हालांकि, बड़ी पीठ के विचार के बाद ही इस मुद्दे पर व्यापक कानूनी स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।

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