नई दिल्ली, राष्ट्रबाण। भारत निर्वाचन आयोग ने मतदाता पंजीकरण प्रक्रिया में महत्वपूर्ण बदलाव करते हुए ऑनलाइन फॉर्म-6 से विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) से जुड़ी घोषणा को अलग कर दिया है। अब नए मतदाताओं को मतदाता सूची में नाम जुड़वाने और एसआईआर से संबंधित घोषणा के लिए अलग-अलग फॉर्म भरने होंगे। आयोग का यह फैसला ऐसे समय आया है, जब फॉर्म-6 में एसआईआर की घोषणा शामिल करने को लेकर दो चुनाव आयुक्तों ने आपत्ति जताई थी और इसे निर्धारित नियमों के अनुरूप नहीं बताया था।
फॉर्म-6 में पहले शामिल थी एसआईआर की घोषणा
इससे पहले ऑनलाइन फॉर्म-6 में सेक्शन जे और के के बीच एसआईआर से संबंधित एक घोषणा शामिल की गई थी। इसके तहत आवेदक को तीन विकल्पों में से किसी एक का चयन करना अनिवार्य था। आवेदक को यह बताना होता था कि उसका नाम या उसके माता-पिता अथवा दादा-दादी का नाम वर्ष 2000 के शुरुआती वर्षों में हुए पिछले विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान मतदाता सूची में शामिल था या नहीं। इस घोषणा का जवाब दिए बिना आवेदन की अगली प्रक्रिया पूरी नहीं की जा सकती थी।
दो चुनाव आयुक्तों ने जताई थी आपत्ति
इस बदलाव पर चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने 16 मई को आपत्ति दर्ज कराई थी। उनका तर्क था कि निर्धारित फॉर्म में इस तरह का बदलाव करने के लिए कानूनी संशोधन आवश्यक है। वहीं, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू ने भी इस व्यवस्था को अनधिकृत और नियमों के विपरीत बताते हुए तत्काल हटाने की बात कही थी। उनका कहना था कि फॉर्म-6 का प्रारूप मतदाता पंजीकरण नियम, 1960 के तहत निर्धारित है और इसमें संशोधन करने का अधिकार केवल केंद्र सरकार के पास है। ऐसे में आयोग द्वारा ऑनलाइन फॉर्म में इस तरह का बदलाव करना उचित नहीं है।
आयोग ने बताई थी एक ही फॉर्म रखने की वजह
चुनाव आयोग ने 26 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट में दाखिल जवाबी हलफनामे में बताया था कि शुरुआत में दोनों प्रक्रियाओं को एक ही फॉर्म में शामिल करने का उद्देश्य आवेदकों की सुविधा बढ़ाना था। अलग-अलग फॉर्म भरने की स्थिति में आवेदकों को दो बार ओटीपी और दो बार इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर (ई-सिग्नेचर) की प्रक्रिया पूरी करनी पड़ती, जबकि एक ही फॉर्म में एक ओटीपी और एक ई-सिग्नेचर से दोनों काम पूरे हो सकते थे। हालांकि, आयोग ने स्वीकार किया कि ऑनलाइन मंच पर एसआईआर घोषणा को फॉर्म-6 के भीतर जिस तरह प्रदर्शित किया गया, उससे यह धारणा बन सकती थी कि आयोग ने निर्धारित फॉर्म में संशोधन कर दिया है। इसके बाद 21 अक्टूबर को दोनों प्रक्रियाओं को अलग करने का फैसला लिया गया।
10 महीने में 14 बार दर्ज हुईं लिखित आपत्तियां
सूत्रों के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में आयोग के फैसलों पर कम से कम 14 बार लिखित आपत्तियां दर्ज कराई थीं। इनमें मतदाता सूची में नाम जोड़ने, नाम हटाने और बहाल करने से लेकर आयोग के सॉफ्टवेयर तथा प्रशासनिक कामकाज से जुड़े मुद्दे शामिल थे। इन आपत्तियों के बाद आयोग ने हाल के हफ्तों में कई अन्य महत्वपूर्ण बदलाव भी किए हैं। फॉर्म-6 से एसआईआर घोषणा को अलग करने का फैसला भी इसी क्रम में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।


