रायपुर/नई दिल्ली, राष्ट्रबाण। छत्तीसगढ़ राज्योत्सव के भव्य अलंकरण समारोह के मंच से केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने विपक्ष और कांग्रेस नेता राहुल गांधी पर अब तक का सबसे बड़ा और तीखा हमला बोला है। गृह मंत्री ने दो टूक शब्दों में कहा कि सिर्फ हाथ में संविधान की प्रति लेकर घूमने से कोई संविधान का सच्चा रक्षक नहीं बन जाता, इसके लिए आचरण और नीतियां भी संवैधानिक होनी चाहिए।
अमित शाह ने नवा रायपुर में आयोजित कार्यक्रम के दौरान राहुल गांधी को आड़े हाथों लेते हुए आरोप लगाया कि कांग्रेस और विपक्षी दल हमेशा से संविधान विरोधियों और माओवादियों के परोक्ष समर्थक रहे हैं। इसके साथ ही शाह ने ‘एसआईआर’ (SIR) के मुद्दे पर संसद का विशेष सत्र बुलाकर सीधे मंच से राहुल गांधी को सामने बैठकर बहस करने की खुली चुनौती दे डाली।
संसद में माओवाद का समर्थन करता है विपक्ष
समारोह को संबोधित करते हुए केंद्रीय गृह मंत्री ने कहा कि देश ने वह दौर भी देखा है जब गैर-संवैधानिक ताकतों और सरकारों को संरक्षण देने वाले लोगों ने ‘नकली संसद’ खड़ी करके असली लोकतंत्र और भारतीय संसद का मजाक उड़ाया। शाह ने आरोप लगाया कि राहुल गांधी और उनकी पार्टी संसद के भीतर और बाहर लगातार ऐसे तत्वों की ढाल बनते रहे हैं जो देश की अखंडता और संविधान को चुनौती देते हैं।
उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी भी देश में संविधान का सम्मान उसकी रक्षा करने वाले नियमों और नीतियों के पालन से झलकता है, न कि केवल राजनैतिक मंचों पर संविधान की किताब लहराने की ड्रामेबाज़ी से।
चिदंबरम के 2010 के बयान का जिक्र: बातचीत नहीं, आत्मसमर्पण की नीति ने मिटाया माओवाद
अमित शाह ने पूर्व गृह मंत्री पी. चिदंबरम के 2010 में दिए गए उस बयान को याद दिलाया, जिसमें कांग्रेस नीत सरकार ने माओवादियों से हथियार डाले बिना ही बातचीत की वकालत की थी। शाह ने तत्कालीन और वर्तमान नीतियों का अंतर समझाते हुए कहा- हमारी सरकार का रुख शुरू से स्पष्ट और कठोर रहा। हमने माओवादियों को साफ संदेश दिया कि अगर वे हथियार डालकर आत्मसमर्पण करते हैं, तो सरकार उन्हें मुख्यधारा से जोड़ेगी और पूरा संरक्षण देगी। लेकिन अगर वे हिंसा का रास्ता चुनेंगे, तो उन्हें बख्शा नहीं जाएगा।
शाह ने आंकड़े साझा करते हुए दावा किया कि सरकार की इसी दृढ़ नीति का नतीजा है कि आज देश माओवादी हिंसा के जाल से लगभग मुक्त हो चुका है। उन्होंने बताया कि अभियान के तहत केवल 10 प्रतिशत हिंसक माओवादियों को ही कार्रवाई में ढेर किया गया, जबकि 90 प्रतिशत से अधिक माओवादी रास्ते से हटकर हथियार डालकर मुख्यधारा में शामिल हो चुके हैं।
मानवाधिकार की आड़ पर करारा प्रहार, आदिवासियों के हक छीनना मानवाधिकार नहीं
मानवाधिकार के मुद्दे पर विपक्षी नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं के रुख को शाह ने पूरी तरह ढोंग करार दिया। उन्होंने कहा कि बंदूक और हिंसा के बल पर देश के सबसे पिछड़े इलाकों में विकास के पहिये को रोक देना किसी भी कोण से मानवाधिकार की रक्षा नहीं है।
शाह ने बेहद कड़े लहजे में कहा कि जब माओवादियों ने जंगलों में ‘सांस्कृतिक गलियारे’ की जगह खूनी ‘रेड कॉरिडोर’ बना दिया था, तब मानवाधिकार के झंडाबरदार चुप थे। माओवादियों ने जंगलों में बारूदी सुरंगें बिछाईं, गरीब आदिवासियों के बच्चों को स्कूलों से अगवा कर उनके हाथों में किताबें छीनकर बंदूकें थमाईं, और अस्पतालों, स्कूलों तथा सड़कों को बम से उड़ा दिया। क्या उन गरीब और बेकसूर आदिवासियों के अधिकारों की कोई चिंता नहीं होनी चाहिए?
गृह मंत्री ने कहा कि असली मानवाधिकार तो यह है कि बस्तर और छत्तीसगढ़ के दूरदराज इलाकों में रहने वाले अंतिम आदिवासी बच्चे तक शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क और बिजली का अधिकार पहुंचे।
SIR और संविधान पर सीधी बहस की चुनौती
भाषण के अंतिम चरण में अमित शाह का रुख और अधिक हमलावर नजर आया। उन्होंने कहा कि सरकार संसद का विशेष सत्र बुलाकर एसआईआर (SIR) जैसे गंभीर और राष्ट्रहित से जुड़े विषय पर हर तरह की चर्चा कराने को तैयार है।
उन्होंने राहुल गांधी का नाम लेते हुए ललकारा, अगर कांग्रेस और उनके नेताओं में नैतिक साहस है, तो वे संसद के पटल पर आएँ और तर्कों के साथ बहस करें। जनता देख रही है कि कौन संविधान के सिद्धांतों पर चलता है और कौन सिर्फ राजनीति चमकाने के लिए संविधान का नाम इस्तेमाल करता है।


