नई दिल्ली, राष्ट्रबाण। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर संस्कृत का एक प्रेरणादायक सुभाषित साझा किया। इस श्लोक के माध्यम से उन्होंने सत्य, विद्या, स्वच्छता और सदाचार के महत्व को रेखांकित किया। प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा से जुड़े इस संदेश में बताया गया है कि जीवन के महत्वपूर्ण मूल्यों की रक्षा किस प्रकार की जा सकती है।
प्रधानमंत्री मोदी ने जो श्लोक साझा किया, वह है—
सत्येन रक्ष्यते धर्मो विद्याभ्यासेन रक्ष्यते।
मृजया रक्ष्यते रूपं कुलं वृत्तेन रक्ष्यते॥
इसका अर्थ है कि सत्य के पालन से धर्म की रक्षा होती है, नियमित अभ्यास से विद्या सुरक्षित रहती है, स्वच्छता और सजगता से रूप की रक्षा होती है तथा अच्छे आचरण और सदाचार से परिवार की प्रतिष्ठा बनी रहती है।
श्लोक की हर पंक्ति में छिपी है जीवन की सीख
इस सुभाषित की प्रत्येक पंक्ति मनुष्य को जीवन में नैतिकता और अनुशासन अपनाने की प्रेरणा देती है। ‘सत्येन रक्ष्यते धर्मः’ का भाव है कि सत्य का पालन ही धर्म का आधार है। वहीं ‘विद्याभ्यासेन रक्ष्यते’ बताता है कि ज्ञान को बनाए रखने के लिए निरंतर अध्ययन और अभ्यास जरूरी है। यदि व्यक्ति नियमित रूप से अभ्यास नहीं करता, तो समय के साथ उसका ज्ञान कमजोर पड़ सकता है। इसी तरह ‘मृजया रक्ष्यते रूपम्’ का आशय स्वच्छता, सजगता और सुव्यवस्थित जीवनशैली से है। अंतिम पंक्ति ‘कुलं वृत्तेन रक्ष्यते’ यह संदेश देती है कि किसी परिवार या वंश की प्रतिष्ठा उसके सदस्यों के अच्छे चरित्र, व्यवहार और सदाचार से कायम रहती है।
महाभारत में विदुर ने धृतराष्ट्र को दिया था उपदेश
यह सुभाषित महाभारत के उद्योग पर्व में वर्णित विदुर और राजा धृतराष्ट्र के संवाद से जुड़ा है। इस संवाद में धृतराष्ट्र जीवन, कर्म, परवशता और दैवी शक्ति से जुड़े सवालों पर विदुर से मार्गदर्शन मांगते हैं। इसके जवाब में विदुर उन्हें धर्म, नैतिकता, सदाचार और एक आदर्श शासक के कर्तव्यों के बारे में समझाते हैं। विदुर अपने उपदेशों में बताते हैं कि मोह, लोभ और अहंकार मनुष्य को गलत रास्ते पर ले जा सकते हैं, जबकि सत्य, विवेक और अच्छे आचरण से व्यक्ति सही दिशा में आगे बढ़ सकता है। यह सुभाषित भी इसी विचार को सामने रखता है कि जीवन में प्रतिष्ठा और मूल्यों को बनाए रखने के लिए केवल ज्ञान पर्याप्त नहीं, बल्कि उसका पालन करना भी जरूरी है।


