कूथुपट्टाराई के मंच से प्रस्तुति ‘पाटलीपुत्रम्’, जिना राजासेकरन के निर्देशन में, श्रम, जीवित रहने और सामाजिक असमानता की एक गहरी और मार्मिक पड़ताल है। यह नाटक दर्शकों के सामने शोषण के सिलसिले में देखा गया जीवन, जाति भेदभाव और अस्तित्व की लड़ाई को जीवंत करते हुए उपस्थित होता है। कहानी के माध्यम से यह नाटक हमें उस जटिल संसार में ले जाता है, जहां हर दिन के संघर्ष के बीच भी सम्मान और गरिमा के लिए लगातार जंग जारी रहती है।
नाटक ‘पाटलीपुत्रम्’ के निर्देशन की कमान के.आर. राजारविवर्मा के हाथों में है, जिन्होंने इस संवेदनशील विषय को सक्षम और प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया है। मंचन में प्रयोग की गई संगीत और गति उन भावनाओं को गहराई से चित्रित करती हैं, जो पात्रों के अनुभवों को दर्शाती हैं। पात्रों के प्रदर्शन में जो प्राकृतिकपन और सच्चाई देखने को मिलती है, वह दर्शकों के मन में लंबे समय तक गूंजती रहती है।
इस नाटक का केंद्र बिंदु श्रमिकों का शोषण और उनके भीतर की लड़ाई है जो सामाजिक और आर्थिक असमानताओं से प्रभावित होती है। जातिगत भेदभाव का मुद्दा भी नाटक का प्रमुख विषय है, जो यह संदेश देता है कि आज भी हमारे समाज में वर्ग भेद और अनदेखी कितनी गहराई तक फैली हुई हैं। ‘पाटलीपुत्रम्’ न केवल एक कलात्मक प्रयास है, बल्कि यह विचारों और सामाजिक जागरूकता को भी प्रेरित करता है।
श्रम के माध्यम से जीवन-यापन की जद्दोजहद को इस प्रकार दिखाना कि दर्शक उसमें अपने या समाज के किसी पहलू को पहचान सकें, इस नाटक की सबसे बड़ी विशेषता है। यह एक संवेदनशील और सच्चे अनुभवों को सामने लाने वाला मंचन है, जो दिखाता है कि किस तरह भेदभाव और भूख के खिलाफ लड़ाई मानव अस्तित्व की सबसे बड़ी चुनौती बन चुकी है।
अंततः, ‘पाटलीपुत्रम्’ सामाजिक रूप से जागरूक पात्रों का परिचय कराता है, जो अपने दर्द, अपने संघर्ष और अपनी उम्मीदों को मंच पर जीवंत करते हैं। यह नाटक हमें सोचने पर मजबूर करता है कि किस प्रकार हम एक ज़्यादा न्यायसंगत समाज की ओर बढ़ सकते हैं, जहां हर व्यक्ति को सम्मान और गरिमा मिले। इस नाटक की प्रस्तुति निश्चित रूप से कला और समाज के बीच एक महत्वपूर्ण संवाद स्थापित करती है।

