कैसे बेनॉय बर्ह ने अजंता की गुफाओं की भित्तिचित्रों को कम रोशनी तकनीक से कैद किया

Rashtrabaan

    बेंगलुरू इंटरनेशनल सेंटर में हाल ही में आयोजित एक व्याख्यान में कला इतिहासकार एवं फोटोग्राफर बेनॉय बर्ह ने देशभर के ऐतिहासिक स्मारकों में स्थित प्राचीन भित्तिचित्रों पर अपनी व्यापक डॉक्यूमेंटेशन प्रक्रिया साझा की। उन्होंने विशेष रूप से कम रोशनी तकनीक (लॉ-लाइट टेक्नीक) का उपयोग कर इन कला के अभेद्य और आकर्षक पहलुओं को पकड़ने की चुनौती पर प्रकाश डाला।

    बेनॉय बर्ह ने बताया कि भारत के विभिन्न प्राचीन स्मारकों में भित्तिचित्र अत्यंत नाज़ुक और संवेदनशील होते हैं, इसलिए इनमें काम करना एक जटिल अनुभव होता है। कम रोशनी में इन्हें कैप्चर करने के लिए पारंपरिक फोटोग्राफी उपाय पर्याप्त नहीं होते। उन्होंने विशेष लो-लाइट फोटोग्राफी तकनीक के जरिये इन चित्रों के सूक्ष्म विवरणों को बिना किसी नुकसान के रिकॉर्ड किया।

    इस तकनीक के माध्यम से वे कला के रंगों, बनावट और अभिव्यक्ति को उसी तरह सामने ला पाते हैं, जैसा कि आदिम कलाकारों ने इन्हें बनाया था। इस प्रक्रिया में उच्च गुणवत्ता वाले कैमरे और विशेष लेंस का प्रयोग होता है, साथ ही शटर स्पीड और एक्सपोजर के सही संयोजन से भित्तिचित्रों के विवरण स्पष्ट रूप में उभरते हैं।

    बेनॉय ने अपनी बात में यह भी बताया कि पारंपरिक प्रकाश स्रोतों के उपयोग से भित्तिचित्रों को नुकसान पहुंचने का खतरा रहता है, इसलिए उनके द्वारा अपनाई गई तकनीक संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए विकसित की गई है। उनका प्रयास इन कलाकृतियों को डिजिटल माध्यम से संरक्षित और विश्व के सामने प्रस्तुत करना है, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी इन विरासतों की महत्ता समझ सकें।

    उन्होंने भारत के अजंता गुफाओं के कला कार्यों की फोटोसंग्रह प्रदर्शित की, जहां उनके प्रयासों ने इन सदियों पुराने भित्तिचित्रों को ऐसे रूप में प्रस्तुत किया जो पहले कभी देखने को नहीं मिला। इस डॉक्यूमेंटेशन से न केवल कला इतिहासकारों को नई जानकारी मिली है बल्कि आम जनता में भी सांस्कृतिक जागरूकता बढ़ी है।

    व्याख्यान में उपस्थित साहित्यकारों, कलाकारों और प्राचीन कला संरक्षण विशेषज्ञों ने बेनॉय के कार्य की प्रशंसा की और ये माना कि इस तरह की तकनीकी पहल से भारतीय कला की असली अनुभूति और संरक्षण दोनों संभव हो पाएंगे।

    बेनॉय बर्ह की यह प्रस्तुति केवल फोटोग्राफी का एक तकनीकी दस्तावेज़ नहीं थी, बल्कि भारतीय संस्कृति के अमूल्य धरोहर को समझने, संरक्षित करने और भविष्य के लिए सुरक्षित रखने का एक समर्पित प्रयास थी।

    इस व्यापक और सूक्ष्म दृष्टिकोण ने कला और संस्कृति के प्रति लोगों की समझ को और गहराई प्रदान की है, और यह सुनिश्चित किया है कि प्राचीन कलाकृतियां समय के साथ खत्म न हों बल्कि उनकी सुंदरता और महत्व सदाबहार बनी रहे।

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