गोरखपुर लौटे योगी, अमित शाह के फोन ने बदली पूरी कहानी, सीएम बनने का अनसुना रास्ता

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    नई दिल्ली। मंदिरों के अन्दर गोरक्षपीठाधीश्वर योगी आदित्यनाथ की छवि न केवल एक धार्मिक नेता के रूप में है, बल्कि वे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के तौर पर भारतीय राजनीति की एक मजबूत شخصیت बन चुके हैं। उनका नाम देश के सबसे प्रभावशाली मुख्यमंत्रियों में शुमार किया जाता है, जिनकी नीति और प्रशासन से अपराधी और माफिया भी कांपते हैं।

    योगी आदित्यनाथ का जन्म 5 जून 1972 को उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल के पंचूर गांव में हुआ। उनका असली नाम अजय सिंह बिष्ट था। बचपन से ही उनकी रुचि राजनीति में रही और वे एबीवीपी के सदस्य रहे। छात्रसंघ चुनाव में हालांकि उन्हें समर्थन नहीं मिला, लेकिन उन्होंने मैदान में उतरकर अपनी भागीदारी दर्ज कराई। उनकी राजनीतिक यात्रा में एक दिलचस्प बात यह थी कि उनके जीजा लेफ्ट स्टूडेंट संगठन के सदस्य थे, पर उन्होंने एबीवीपी को चुना।

    2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले योगी आदित्यनाथ ने कई महीनों तक कड़ी मेहनत की। चुनाव प्रचार का दौर समाप्त होने पर वे गोरखपुर लौटने की तैयारी कर रहे थे और विदेश मंत्रालय के एक स्पेन दौरे के ऑफर को भी स्वीकारने वाले थे। हालांकि प्रधानमंत्री कार्यालय ने उनका नाम इस दौरे से हटा दिया था, जिसके कारण उन्हें यह समझ नहीं आया कि ऐसा क्यों हुआ।

    चुनाव परिणाम आने वाले थे और भाजपा पूरी तरह आश्वस्त थी कि वह प्रदेश की सत्ता अपने हाथ में लेगी। तब भी योगी गोरखापुर लौट चुके थे जब उन्हें एक फोन आया, जो उस समय की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज का था। इस फोन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संदेश था, जिसमें उनकी मुख्यमंत्री बनने की बात छिपी हुई थी।

    11 मार्च 2017 को हुए चुनाव में भाजपा ने अभूतपूर्व बहुमत से 312 सीटें जीतीं। इस विजय के बाद मुख्यमंत्री पद के लिए कई नामों पर चर्चा शुरू हुई, जिसमें योगी आदित्यनाथ का नाम प्रारंभ में पीछे था। पर अमित शाह ने स्थिति को बदला, वे खुद योगी से मिलने उनके आवास पर गए और मुख्यमंत्री बनने का प्रस्ताव दिया। इसके बाद भाजपा विधायक दल की बैठक में योगी का नाम मुख्यमंत्री के रूप में घोषित कर दिया गया।

    कई मीडिया रिपोर्ट्स में यह भी सामने आया कि आरएसएस ने मार्च 2016 में गोरखनाथ मंदिर में एक बैठक के दौरान योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनाने का निर्णय पहले ही ले लिया था। जब भाजपा को विधानसभा में बहुमत मिला, तो यह फैसला और सुगम हो गया।

    योगी आदित्यनाथ के राजनीतिक गुरु महंत अवैद्यनाथ थे, जिन्होंने गोरखपुर की राजनीति में उनका मार्गदर्शन किया। लगभग 26 वर्ष की उम्र में उन्होंने पहली बार लोकसभा चुनाव लड़ा और सबसे युवा सांसद बने। इसके बाद 1999, 2004, 2009 और 2014 के चुनावों में लगातार जीत हासिल की।

    आज योगी आदित्यनाथ ने उत्तर प्रदेश की राजनीति को नई दिशा दी है। उनकी ‘योगी नीति’ अपराध पर सख्ती और विकास पर जोर देती है, जिसका प्रभाव केवल प्रदेश तक सीमित नहीं है, बल्कि अन्य राज्यों तक भी फैला है। उनके नेतृत्व में उत्तर प्रदेश में कानून व्यवस्था में सुधार हुआ है और यह देश के लिए एक उदाहरण बन गया है।

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