निर्देशक पंडिराज की फिल्म “परिमला” का मुख्य फोकस परिमला परिवार पर है, जो हत्या के बाद गुज़र-बसर करने की कोशिश करता है। हालांकि कहानी में गंभीर विषयवस्तु के बावजूद, फिल्म दर्शकों के लिए मनोरंजन का साधन बनने में विफल रहती है।
फिल्म की कहानी इस परिवार के आसपास घूमती है, जो एक अप्रत्याशित हत्या के बाद जीवन के नए अध्याय की शुरुआत करता है। यह प्लॉट सोचने पर मजबूर करता है, लेकिन इसमें कहानी की प्रस्तुति में कमी नज़र आती है। जयाराम और उर्वशी जैसे अनुभवी कलाकारों की मौजूदगी के बाद भी, उनकी भूमिका प्रभावशाली नहीं लगती।
कॉमेडी की कोशिशें अक्सर फिसलती हुई लगती हैं और संवादों में नवीनता की कमी महसूस होती है, जिससे दर्शक बोरियात महसूस कर सकते हैं। फिल्म के कई हिस्सों में ट्राइट और पूर्वानुमेयता स्पष्ट झलकती है, जो इसे उबाऊ बना देती है। कथानक में विकास कमज़ोर है और पात्रों का सही विकास भी देखने को नहीं मिलता।
तकनीकी स्तर पर फिल्म में कुछ सुधार हो सकता था, जैसे बेहतर संपादन और निर्देशन, जिससे कहानी में तालमेल बढ़ता। पंडिराज के निर्देशन में, जो फिल्मों को भावनात्मक रूप से मजबूत बनाने के लिए जाने जाते हैं, इस बार कहानी का प्रभाव कमजोर पड़ता है।
इस प्रकार, “परिमला” एक ऐसी फिल्म साबित हुई जो अपनी गंभीर विषयवस्तु के बावजूद दर्शकों की अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतर पाई। यह फिल्म न केवल कहानी में कमजोर है, बल्कि मनोरंजन के लिहाज़ से भी पूर्ति नहीं कर पाती, जिससे दर्शक इसे देखने में मुश्किल महसूस कर सकते हैं।

