भोपाल। मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल स्थित बरकतउल्ला विश्वविद्यालय के नाम को बदलकर वाग्देवी भोजपाल विश्वविद्यालय करने के प्रस्ताव के खिलाफ व्यापक विरोध शुरू हो गया है। भारतीय राष्ट्रीय छात्र संगठन (एनएसयूआई) ने इस फैसले का कड़ा विरोध करते हुए विश्वविद्यालय के मुख्य द्वार पर सद्भावना और बुद्धि की प्राप्ति के लिए हवन किया, जबकि मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) ने इस प्रस्ताव को स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का अपमान करार दिया है।
जानकारी के अनुसार, विश्वविद्यालय की कार्य समिति ने हाल ही में यह प्रस्ताव पारित किया है कि बरकतउल्ला विश्वविद्यालय का नाम बदलकर वाग्देवी भोजपाल विश्वविद्यालय रखा जाए। इस प्रस्ताव को शासन को मंजूरी के लिए भेजा गया है। इसे लेकर एनएसयूआई की ओर से विश्वविद्यालय परिसर में भारी विरोध प्रदर्शन हुआ।
एनएसयूआई के प्रदेश उपाध्यक्ष रवि परमार ने बताया कि बरकतउल्ला विश्वविद्यालय जिले और प्रदेश की शिक्षा व संस्कृति की एक ऐतिहासिक और प्रतिष्ठित पहचान है। इसका नाम देश के महान स्वतंत्रता सेनानी मौलाना बरकतउल्ला भोपाली के सम्मान में रखा गया था। इसलिए इस नाम को बदलना इतिहास और विरासत के प्रति एक अपमान है। उन्होंने कहा कि सरकार तथा विश्वविद्यालय प्रशासन को शिक्षा, शोध, विद्यार्थियों की समस्याओं और भ्रष्टाचार जैसे वास्तविक मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए, न कि इस प्रकार के विवादित विषयों से ध्यान हटाने का प्रयास करना चाहिए।
वहीं, माकपा के राज्य सचिव जसविंदर सिंह ने कहा कि मौलाना बरकतउल्ला भोपाली स्वतंत्रता संग्राम के उन नेताओं में से थे जिन्होंने 1915 में विदेश में रहते हुए गदर आंदोलन में भाग लिया और भारत के स्वतंत्रता संघर्ष को नई दिशा दी। उन्होंने बताया कि मौलाना बरकतउल्ला भोपाली ने भारत की पहली निर्वासित सरकार का गठन किया जिसका राजा महेन्द्र प्रताप सिंह राष्ट्रपति और वे इसके प्रधानमंत्री थे। माकपा ने इस प्रस्ताव को भाजपा की सांप्रदायिक और इतिहास विरोधी नीतियों का हिस्सा बताया।
जसविंदर सिंह ने बताया कि इस सरकार ने न केवल ब्रिटिश शासन के अंत की घोषणा की थी बल्कि लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद को अपना लक्ष्य बनाया था। उनका यह भी कहना था कि नाम परिवर्तन का यह फैसला स्वतंत्रता संग्राम की उस गहरी विरासत के साथ छलावा है जो मौलाना बरकतउल्ला भोपाली ने स्थापित की है।
इस विवाद ने विश्वविद्यालय और प्रदेश की राजनीतिक व सामाजिक बहस को गरमा दिया है। छात्र संगठन एवं राजनीतिक दल इस मुद्दे को लेकर लगातार सरकार और प्रशासन के खिलाफ अपनी आवाज उठा रहे हैं। ऐसे में यह देखना जरूरी होगा कि शासन स्तर पर इस प्रस्ताव को लेकर क्या अंतिम निर्णय लिया जाता है और क्या इस विवाद का कोई समाधान निकलता है।

