कलामंडलम कृष्णदास ने अपनी 50 वर्षीय चेंदा यात्रा पर की विचार-विमर्श

Rashtrabaan

    पल्लास्सना के ग्रामीण कण्यर्कली से लेकर कथकली तक, 60 वर्षीय प्रसिद्ध तालवादक कलामंडलम कृष्णदास ने परंपरा के बदलते ध्वनिमान पर गहराई से चर्चा की है। उनके अनुसार, संगीत और नृत्य के इन प्राचीन रूपों ने समय के साथ अपने स्वरूप और प्रवाह में बदलाव देखा है, लेकिन उनकी सांस्कृतिक आत्मा आज भी जीवित है।

    कण्यर्कली जहां एक पारंपरिक लोक नृत्य है जो ग्रामीण जीवन की कहानियां कहता है, वहीं कथकली एक शास्त्रीय नाटक नृत्य है जिसकी गहनता और भव्यता ने सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया है। कृष्णदास ने बताया कि चेंदा के प्रभाव ने दोनों विधाओं में ताल और लय को नयी ऊंचाई पर पहुँचाया है।

    उन्होंने कहा, “मेरा संगीत जीवन पल्लास्सना की मिट्टी से जुड़ा है, जहां मैंने अपनी शुरुआत की। वहां की सरलता और गहराई ने मुझे संगीत के प्रति समर्पित किया।” क्रिश्चनदास ने परंपरागत संगीत को आधुनिक संदर्भ में बनाए रखने के लिए सतत प्रयास किए हैं। उन्होंने बताया कि कैसे युवा पीढ़ी के साथ संवाद स्थापित करना आवश्यक है ताकि ये कलाएं न केवल जीवित रहें बल्कि विकसित भी हों।

    उनका मानना है कि तकनीकी प्रगति और वैश्वीकरण के दौर में विदेशों में सांस्कृतिक मेल-मिलाप से इन शास्त्रीय कलाओं को नई जान मिली है। छोटी-छोटी परंपरागत ध्वनियों में अंतर की समझ बढ़ी है और लोगों का आकर्षण भी अधिक हुआ है।

    कलामंडलम कृष्णदास ने यह भी उल्लेख किया कि श्रोता और कलाकार दोनों के बीच की अंतःक्रिया का संगीत के संवर्धन में अहम योगदान है। उन्होंने युवाओं को प्रशिक्षित करने में सक्रिय भूमिका निभाते हुए कहा कि आने वाली पीढ़ी को हमेशा पुरानी धुनों को सम्मान देना चाहिए लेकिन उन्हें अपनी शैली और अनुभव भी जोड़ने का अवसर देना चाहिए।

    कुल मिलाकर, कृष्णदास का संगीत और उनके अनुभव हमें बताता है कि परंपरा और आधुनिकता के मिलन से ही संस्कृति का विकास संभव है। उनका जीवन और कला हमें यह सिखाती है कि चाहे समय कैसे भी बदले, सच्ची कला की गहराई और प्रभाव स्थिर रहता है।

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