क्या कला एआई से आगे निकल सकती है? सुधराणी रघुपथी का मानना है कि हां

Rashtrabaan

    संगीत नाटक अकादमी फैलोशिप के लिए चुनी गई सुधराणी रघुपथी ने कला और विशेषकर नृत्य को लेकर महत्वपूर्ण विचार साझा किए हैं। वे ऐसे कलाकार हैं, जो अपने समय से कई कदम आगे रहती हैं। सुधराणी का मानना है कि जबकि आज का युग तकनीकी प्रगति की ओर बढ़ रहा है और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) तेजी से विकसित हो रही है, तब भी कला की असली ताकत और विशिष्टता मानव स्पर्श में निहित है।

    वे बताती हैं कि नृत्य एक ऐसी कला है जिसका मूल स्रोत सांस्कृतिक विरासत और मानव अनुभव है, जिसे कोई मशीन पूरी तरह से ग्रहण या दोहरा नहीं सकती। नृत्य में भाव, संवेदना, और सृजनात्मकता की जरूरत होती है, जो केवल मनुष्य ही उपलब्ध करा सकता है। सुधराणी कहती हैं कि एआई नृत्य के तकनीकी और कुछ स्वरूपात्मक पहलुओं में योगदान दे सकता है, लेकिन उसमें मानवीय भावना और जीवन की गहराई नहीं जोड़ सकता।

    सुधराणी रघुपथी ने अपने लंबे अनुभव के दौरान इस बात को बार-बार महसूस किया है कि कला और संस्कृति के संवाहक न केवल तकनीक बल्कि मानवीय भावनाओं और इतिहास से जुड़े रहते हैं। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि नृत्य में शारीरिक अभिव्यक्ति का अपना अहम स्थान होता है, जो तकनीक के माध्यम से पूरी तरह से प्रतिस्थापित नहीं किया जा सकता।

    इस संदर्भ में, उन्होंने नई पीढ़ी के कलाकारों को भी सलाह दी कि वे तकनीक का सहारा अवश्य लें, पर साथ ही अपनी मानवीय संवेदनाओं और सांस्कृतिक मूल्यों को कभी छोड़ें नहीं। उनका सुझाव है कि तकनीक और मानवीय कला के बीच संतुलन बनाकर एक नयी और समृद्ध कलाकृति का निर्माण किया जा सकता है।

    सुधराणी रघुपथी की यह सोच इस युग के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश भी है, जहां तेज गति से बढ़ती तकनीक के बीच मानवता और सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखा जाना जरूरी है। उनकी यह पहल हमें याद दिलाती है कि असली कला वह होती है जो दिल को छूती है, और यह शक्ति आज भी केवल मनुष्यों के पास ही है।

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