इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव स्थगित करने और प्रधानों को प्रशासक बनाए रखने के सरकार के फैसले को कड़ी चेतावनी दी है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि पंचायतों का संविधान के तहत पांच वर्षीय कार्यकाल होता है और इस अवधि के बाद चुनाव कराना अनिवार्य है। हाईकोर्ट ने प्रधानों को प्रशासक के रूप में नियुक्त करने के सरकार के आदेशों पर रोक लगाते हुए चुनाव कराने का स्पष्ट रोडमैप राज्य सरकार से मांगा है।
यह मामला तब उठा जब प्रदेश के 57 हजार से अधिक ग्राम पंचायतों के प्रधानों का कार्यकाल 26 मई 2026 को समाप्त हो गया। उसके बाद राज्य सरकार ने पंचायत चुनाव टालते हुए मौजूदा प्रधानों को प्रशासक बनाए रखने का निर्णय लिया, जिसे एक याचिका के माध्यम से इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी गई।
अदालत के न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन की एकल पीठ ने इस याचिका पर सुनवाई करते हुए 25 और 26 मई को जारी सरकारी आदेशों को गलत घोषित किया। न्यायालय ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 243-ई और 243-के के अनुसार पंचायतों का पांच साल का कार्यकाल होता है, जिसके बाद बिना चुनाव कराए कार्यकाल को आगे बढ़ाना असंवैधानिक है।
सरकार ने चुनाव टालने के पीछे ओबीसी आरक्षण आयोग की रिपोर्ट लंबित होने को कारण बताया, लेकिन अदालत ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के बावजूद आयोग अब तक अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत नहीं कर सका है, जो लोकतंत्र के लिए चिंता का विषय है।
राज्य निर्वाचन आयोग ने कोर्ट को बताया कि मतदाता सूची 10 जून 2026 को प्रकाशित कर दी गई है और चुनाव कराने की पूरी तैयारी है, परन्तु राज्य सरकार की ओर से प्रशासनिक एवं लॉजिस्टिक सहायता प्रदान नहीं की जा रही है। हाईकोर्ट ने सरकार को अंतिम मौका देकर विस्तृत हलफनामा दाखिल करने को कहा है, जिसमें ओबीसी आयोग की प्रगति, चुनाव की समय-सीमा और देरी के कारण स्पष्ट रूप से बताए जाएं।
अदालत ने कहा अगर राज्य सरकार संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं देती है तो 25 मई के आदेश जारी करने वाले अधिकारियों को अगली सुनवाई में व्यक्तिगत उपस्थिति देना होगी। न्यायालय ने असंवैधानिक आदेश देने पर कड़ी कार्रवाई की संभावना जताई है, इसे प्रथम दृष्टया न्यायालय की अवमानना माना जाएगा।
इस निर्णय से प्रदेश के ग्राम पंचायतों में प्रशासनिक संचालन और चुनाव प्रक्रिया पर व्यापक प्रभाव पड़ेगा। पंचायतों के कार्यकाल को लेकर स्थिति स्पष्ट होने तक प्रशासनिक रूप से अनिश्चितता बनी रहेगी। अगली सुनवाई 13 जुलाई को निर्धारित की गई है, जिसमें स्थिति के बारे में अधिक स्पष्टता मिलने की संभावना है।
इस तरह हाईकोर्ट ने लोकतंत्र और ग्राम स्तर पर चुनी गई प्रतिनिधियों के अधिकारों की रक्षा के लिए महत्वपूर्ण कदम उठाया है, जो चुनाव प्रक्रिया को समयबद्ध और संविधानसम्मत बनाए रखने की दिशा में एक बड़ा सन्देश है।

