हरिश दुर्ऐरज की फ़िल्म ‘Con City’ एक रोचक कथावस्तु पर आधारित है, जिसमें ठगों के एक परिवार की कहानी दिखाई गई है। हालांकि फिल्म की पटकथा में मनोरंजक तत्व मौजूद हैं और कलाकारों ने अपनी भूमिका को पूरी निष्ठा से निभाया है, फिर भी यह फ़िल्म शैली को बुद्धिमत्ता समझने की गलती करती है और दर्शकों का पूर्ण विश्वास जीतने में असफल रहती है।
कहानी उन ठगों इर्द-गिर्द घूमती है जो एक दूसरे से बंधे परिवार की तरह काम करते हैं। अर्जुन दास और अन्ना बेन की केमिस्ट्री देखने लायक है, जो परदे पर उनके किरदारों को जीवंत बनाती है। उनकी भूमिकाएं प्रभावशाली हैं, लेकिन पटकथा तथा निर्देशन की कमजोरियां अंततः पूरी फिल्म की ताकत को कम कर देती हैं।
महत्वपूर्ण यह है कि फिल्म शैली पर अधिक फोकस करती है, जिससे कहानी की गहराई और किरदारों के विकास को नुकसान पहुंचता है। दर्शक शुरुआती कुछ हिस्सों में फिल्म में खो जाते हैं, क्योंकि आकर्षक दृश्य और संगीत उन्हें बांधे रखते हैं, परंतु जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, यह एहसास होने लगता है कि फिल्म केरसिकरण और प्लॉट मुख्य विचारधारा के आसपास ही घूमता रहता है।
निर्देशक हरिश दुर्ऐरज ने एक अभिनव विषय चुना है, लेकिन वह फुल पोटेंशियल को प्राप्त नहीं कर पाते। पटकथा में कई जगह ऐसे टेढ़े-मेढ़े मोड़ हैं जो सहज और विश्वसनीय नहीं लगते। साथ ही, संवाद और क्लाइमैक्स दर्शकों की उम्मीदों पर खरा नहीं उतरते, जिससे कहानी की गहराई प्रभावित होती है।
हालांकि, फिल्म का संगीत और सिनेमेटोग्राफी सराहनीय है। दृश्यांकन ऐसा है जो दर्शकों को फिल्म के माहौल में डूबे रहने देता है। कैमरे की चाल और सेट डिज़ाइन एक दम सही जगह पर हैं, जो कहानी की ठगी की दुनिया को यथार्थवादी बनाते हैं।
कुल मिलाकर, ‘Con City’ एक अच्छी कोशिश है, लेकिन शैली के पीछे छिपे असली अर्थ और खेल की गहराई को समझने में चूक जाती है। फिल्म दर्शकों को मनोरंजन जरूर देती है, परंतु वह भरोसा और सस्पेंस उत्पन्न नहीं कर पाती है, जो इस तरह की कहानियों का प्रमुख आकर्षण होता है।
यदि फिल्म ने अपनी कहानी कहने की शैली में संतुलन बनाया होता और पात्रों के चरित्र विकास पर ज्यादा ध्यान दिया होता, तो यह निश्चित रूप से एक यादगार क्राइम ड्रामा बन सकती थी।

