नई दिल्ली, राष्ट्रबाण। राजधानी दिल्ली के ऐतिहासिक रामलीला मैदान में हाल ही में आयोजित ‘इंडिया ब्लॉक’ (INDIA Bloc) की ‘वोट बचाओ, देश बचाओ’ रैली के बाद व्यापारियों का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया है। दीपावली जैसे सबसे बड़े त्योहारी सीजन के ठीक बीच हुई इस राजनीतिक महारैली के कारण दिल्ली के व्यापार को भारी आर्थिक क्षति उठानी पड़ी है। स्थिति यह है कि देश के सबसे पुराने और प्रमुख व्यापारिक संगठनों ने खुलकर नाराजगी जताई है और विपक्षी नेताओं पर तीखा हमला बोला है।
प्रधानमंत्री आर्थिक सलाहकार परिषद का तीखा हमला: “इसकी भरपाई कौन करेगा?”
प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के एक वरिष्ठ सदस्य ने इस पूरी स्थिति पर बेहद कड़ा रुख अपनाया है। उन्होंने कांग्रेस सांसद राहुल गांधी की नीतियों और कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए कहा कि उनकी ‘अराजकता, भ्रम और डर की राजनीति’ के कारण दिल्ली के व्यापारियों को सीधे तौर पर 12,000 करोड़ रुपये का भारी-भरकम नुकसान उठाना पड़ा है। उन्होंने तीखा सवाल पूछते हुए कहा कि इस वित्तीय क्षति की भरपाई आखिर कौन करेगा? आक्रोशित सदस्य ने यहां तक कह दिया कि ऐसी राजनीति करने वाले नेताओं को किसी ऐसी जगह भेज देना चाहिए जहां भीड़-भाड़ न हो, ताकि आम जनता और व्यापारिक गतिविधियां सुरक्षित रह सकें।
1905 के किराना संगठन और ड्राई फ्रूट एसोसिएशन का फूटा गुस्सा
व्यापारिक जगत के जानकारों के अनुसार, साल 1905 में स्थापित देश के सबसे पुराने किराना संगठन ने एक आधिकारिक पत्र लिखकर यह जानकारी दी है कि इन प्रशासनिक अड़चनों और विरोध प्रदर्शनों के कारण अकेले किराना व्यापार को 12,000 करोड़ रुपये का घाटा झेलना पड़ा है। इसके अलावा, राजधानी के सूखे मेवे (ड्राई फ्रूट्स) के व्यापारियों के संगठन ने भी लगभग 1,000 करोड़ रुपये के नुकसान का अनुमान जताया है। त्योहारी सीजन के वक्त इस तरह का बड़ा वित्तीय घाटा व्यापारियों के लिए किसी बड़े संकट से कम नहीं है।
सीटीआई (CTI) का दावा: 20 बड़े बाजार प्रभावित, सिर्फ 20% दुकानें खुलीं
कारोबारी संगठन ‘चैंबर ऑफ ट्रेड एंड इंडस्ट्री’ (CTI) के चेयरमैन बृजेश गोयल ने स्थिति को बेहद चिंताजनक बताया है। सीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक, रामलीला मैदान के आसपास स्थित लगभग 20 प्रमुख बाजारों की व्यापारिक गतिविधियां पूरी तरह ठप रहीं। अधिकांश दुकानें बंद रहीं और दुकानों के गलियारों तथा पार्किंग स्थलों पर प्रदर्शनकारी दरी बिछाकर आराम करते और खाना खाते हुए नजर आए। शाम के समय भी बाजारों में वह चहल-पहल गायब थी जो आमतौर पर दीपावली से पहले देखने को मिलती है। सामान्य दिनों में त्योहारी खरीदारी के लिए आने वाले करीब पांच लाख खरीदारों की तुलना में इस बार बमुश्किल एक लाख लोग ही बाजारों तक पहुंच पाए। डर और अनिश्चितता के माहौल के कारण दिल्ली के आसपास के अन्य शहरों से आने वाले खुदरा व्यापारियों ने भी राजधानी आने से परहेज किया। सीटीआई के अनुसार, इस महारैली और उसके चलते लगाए गए ट्रैफिक प्रतिबंधों के कारण अकेले इन 20 बाजारों में लगभग 11,000 करोड़ रुपये की बिक्री सीधे तौर पर प्रभावित हुई है।
रैली से पहले ही दी गई थी चेतावनी, नेताओं को लिखे गए थे पत्र
व्यापारिक संगठनों का कहना है कि उन्होंने स्थिति की नजाकत को पहले ही भांप लिया था। रैली के आयोजकों द्वारा यह प्रचारित किया गया था कि इसमें 10 लाख से अधिक लोग शामिल होंगे और लगभग 15,000 से 20,000 वाहन दिल्ली की सड़कों पर उतरेंगे। इसे देखते हुए त्योहारी खरीदारी के बुरी तरह प्रभावित होने की आशंका जताई गई थी। व्यापारी संगठनों ने कांग्रेस पार्टी के शीर्ष नेतृत्व- सहित विपक्ष के नेता राहुल गांधी, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव और तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी को पत्र लिखकर यह स्पष्ट आग्रह किया था कि इस महारैली को दीपावली के बाद तक के लिए स्थगित कर दिया जाए।
हालांकि, तमाम अपीलों और चेतावनियों के बावजूद जब रैली का आयोजन हुआ, तो राजधानी में कई दिनों तक भय, तनाव और कड़े ट्रैफिक प्रतिबंधों का माहौल बना रहा। इसका सीधा और विनाशकारी असर स्थानीय व्यापारियों के मुनाफे और आम जनता की सुगमता पर पड़ा। अब व्यापारी वर्ग इस बात पर अड़ा है कि सरकार और राजनीतिक दलों को उनकी इस बड़ी आर्थिक मार की जिम्मेदारी लेनी चाहिए।


