देश में कीमोथेरेपी दवाओं की कमी के बीच केंद्र सरकार ने सिस्प्लेटिन और कार्बोप्लाटिन जैसी प्रमुख दवाओं की कीमतों में वृद्धि को मंजूरी दे दी है। इन दवाओं को कीमोथेरेपी का ‘गरिष्ठ स्तंभ’ माना जाता है, क्योंकि ये कैंसर के इलाज में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाली दवाओं में से हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यह निर्णय दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करने तथा उत्पादन लागत को कवर करने के लिए आवश्यक था।
डॉ. अग्रवाल ने इन दवाओं को कीमोथेरेपी का ‘बैकबोन’ करार देते हुए बताया कि सिस्प्लेटिन और कार्बोप्लाटिन कैंसर के कई प्रकारों के उपचार में अनिवार्य भूमिका निभाते हैं। इनके बिना कैंसर का प्रभावी इलाज मुश्किल हो सकता है। हालांकि इस मूल्य वृद्धि से रोगियों पर वित्तीय दबाव बढ़ने की चिंता भी व्यक्त की जा रही है।
सरकारी अधिकारियों के अनुसार, दवाओं की किल्लत बड़ी वजह उत्पादन की सीमित क्षमता और कच्चे माल की महंगाई है। COVID-19 महामारी के बाद वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला प्रभावित होने के कारण दवाओं की कीमतों में वृद्धि होना अनिवार्य हो गया था। इसके अलावा, दवाओं के निर्माण में इस्तेमाल होने वाले रसायन और अन्य घटकों के दाम बढ़ने से लागत पर असर पड़ा है।
यह निर्णय कीमोथेरेपी से जुड़े अस्पतालों, चिकित्सकों और निर्माताओं के बीच चर्चा के बाद लिया गया है। सरकार ने आश्वासन दिया है कि कीमतों में वृद्धि से आवश्यक दवाओं की उपलब्धता में कोई बाधा नहीं आएगी और मरीजों को बेहतर उपचार मिलेगा। साथ ही, गरीब एवं आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए विशेष राहत योजनाओं पर भी विचार जारी है।
कई स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने भी कहा कि एक संतुलित नीति बनाकर, दवाओं की कीमतों और उपलब्धता के बीच सामंजस्य स्थापित करना होगा ताकि मरीजों पर आर्थिक बोझ कम किया जा सके। कीमोथेरेपी दवाओं की अधिकतम पहुँच और समय पर उपलब्धता कैंसर के इलाज में सफलता की कुंजी मानी जाती है।
सरकार इस बात को भी दूर करेगी कि दवाओं की कीमत वृद्धि से मार्केट में काला बाजारी और कालाबाजारी न हो। इसके लिए उचित निगरानी और कड़े नियम बनाए जाएंगे। फिलहाल, केंद्र की यह मंजूरी उन सीमित निर्माताओं को उत्पादन बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित करेगी जो कि देश की ज़रूरतों को पूरा करने में समर्थ हैं।
इस खबर का सीधा असर उन लाखों कैंसर रोगियों पर होगा जो इन दवाओं पर भरोसा करते हैं और जिनके लिए समय पर उचित इलाज बेहद महत्वपूर्ण होता है। सरकार का यह कदम दवा आपूर्ति श्रृंखला को मजबूर करने और गुणवत्तापूर्ण चिकित्सा सुगमता प्रदान करने की दिशा में एक अहम पहल माना जा रहा है।

