सहारनपुर। उत्तराखंड से लगे उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जनपद में राजनीतिक गतिविधियां तेज होने लगी हैं। कुछ दिनों पहले कांग्रेस सांसद इमरान मसूद की अगुवाई में गागलहेड़ी में सदस्यता ग्रहण सम्मेलन हुआ, जिसने क्षेत्र की सियासी दशा को नए मोड़ पर ला दिया है। इस सम्मेलन के बाद अन्य राजनैतिक दलों में भी हलचल देखी जा रही है। राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो कांग्रेस इस बार सहारनपुर की सभी विधानसभा सीटों पर बिना गठबंधन के अपने उम्मीदवार उतारेगी।
कांग्रेस की इस रणनीति का भाजपा पर सकारात्मक और नकारात्मक दोनों प्रकार से प्रभाव पड़ सकता है। भाजपा के आंतरिक सर्वे में यह सामने आया है कि पार्टी के पांच में से चार विधायकों का प्रदर्शन ठीक नहीं रहा है, जिसके कारण उनके टिकट कटने की संभावना प्रबल हो रही है। पार्टी इस बार नयी हुई संभावनाओं के साथ चुनाव मैदान में उतरेगी, जिससे चुनावी मुकाबला और भी दिलचस्प हो जाएगा।
हाल ही में भाजपा से कांग्रेस में शामिल हुए कई बड़े नेता हैं, जिनमें पूर्व विधायक मसूद अख्तर, जेल में सजा काट रहे पूर्व कैबिनेट मंत्री व सपा नेता आजम खान के निकटस्थ यार सरफराज खान, इरशाद चौधरी, रईस मलिक, इमरान मलिक, अफजल, राजपाल सिंह करनवाल, इसरार व मंसूर जैसे कई नाम शामिल हैं। ये सभी नेता पहले भी इमरान मसूद के संपर्क में थे और इन्हें कांग्रेस की प्राथमिकता में रखा जा सकता है।
इमरान मसूद के नेतृत्व में कांग्रेस सामाजिक व राजनीतिक समीकरण साधने की कोशिश कर रही है, लेकिन चुनौती यह है कि उनके पास हिंदू समुदाय से कोई बड़ा चेहरा नहीं है। इससे अगर कांग्रेस मुस्लिम उम्मीदवारों को प्रोत्साहित करती है तो भाजपा को इसका लाभ मिल सकता है क्योंकि बेहट और देहात सीटें सपा के कब्जे में हैं और बाकी अधिकांश सीटें भाजपा के पास हैं।
चुनावी सीटों पर मुस्लिम उम्मीदवारों के दोहरे मुकाबले से भाजपा की स्थिति मजबूत हो सकती है। सदर सीट पर वरिष्ठ कांग्रेस नेता जावेद साबरी टिकट के लिए दावेदारी कर रहे हैं जबकि अन्य क्षेत्रीय सीटों पर भी कांग्रेस के कई दावेदार हैं। भाजपा की तरफ से चार विधायकों के टिकट कटने की चर्चा जोरों पर है।
वरिष्ठ पत्रकार अवनींद्र कमल का मानना है कि सदर सीट पर बदलाव तय है और गंगोह सीट पर राज्य मंत्री जसवंत सिंह सैनी को चुनाव लड़ाने पर विचार हो रहा है। पूर्व मंत्री डॉ. धर्म सिंह सैनी भी सक्रिय हैं और नकुड़ क्षेत्र में मजबूत पकड़ बनाये हुए हैं। बेहट और देहात जिले पर भाजपा नया चेहरा उतार सकती है। अगर सदर सीट से राघव लखन पाल शर्मा को उम्मीदवार बनाया गया तो भाजपा की स्थिति मजबूत होगी, जबकि वर्तमान विधायक राजीव गुंबर भी पूरी ताकत से चुनाव लड़ेंगे।
भाजपा को सत्ता विरोधी माहौल का भी सामना करना पड़ सकता है। कथित अवैध वसूली, खनन कारोबारियों से रिश्वतखोरी, सरकारी अफसरों से धन उगाही और जमीन के धंधों में संभावित लिप्तता की शिकायतें पार्टी के लिए चुनौती पैदा कर रही हैं। अभी तक कोई पक्का निर्णय नहीं लिया गया है, लेकिन अगर भाजपा पुरानी रणनीति और नेताओं पर भरोसा करती है तो इस बार उसके लिए चुनाव कठिन होगा। इसके अलावा, कांग्रेस सांसद इमरान मसूद की सक्रियता से भाजपा के कुछ नेता अपने मत बदल सकते हैं, जिससे राजनीतिक समीकरण और जटिल हो सकते हैं।

