निर्माताओं के पास ‘उयिर’ जैसी एक असाधारण सच्ची कहानी थी, जिसमे मानवीय भावनाओं की भरपूर गहराई छिपी थी। इस कहानी को समझदारी से परदे पर उतारने के लिए इतनी संभावनाएं मौजूद थीं कि दर्शकों को एक अनूठा अनुभव मिल सकता था। लेकिन अफसोस की बात यह है कि यह संभावनाएं फिल्म में पूरी तरह नज़र नहीं आईं।
फिल्म का आधार एक सजीव कहानी होने के बावजूद पटकथा और प्रस्तुति में वह जादू नहीं दिखा जो एक सच्ची कहानी को जीवंत बना सके। पटकथा कुछ जगहों पर बहुत ही धीमी और औसत प्रतीत होती है, जबकि संवाद भी भावनाओं की गहराई को छू नहीं पाते। निर्देशक की कोशिशों के बावजूद कहानी की प्रभावशाली प्रस्तुति में कमी साफ़ महसूस होती है।
अभिनय की दृष्टि से कुछ कलाकारों ने अपनी भूमिकाओं को ठीक से निभाया, परन्तु पूरी टीम के प्रयासों के बावजूद कहानी का वह प्रभाव पैदा नहीं हो पाया जो एक सच्ची घटना को लेकर बनाई गई फिल्म से अपेक्षित होता है। दर्शक भावनात्मक जुड़ाव महसूस करने में असमर्थ रह जाते हैं, जो किसी भी फिल्म की सफलता के लिए बेहद जरूरी होता है।
तकनीकी पक्ष पर भी कई कमियां दिखती हैं, जिनमें सिनेमैटोग्राफी और संपादन का अद्यतन स्तर नहीं होना शामिल है। इससे फिल्म की गति और भावनाओं का प्रवाह बाधित हुआ है। निर्देशक ने नयी विधाओं को अपनाने के बजाय पुराने और धीमे पुलिस प्रक्रियात्मक तरीकों का अनुसरण किया है, जो आज के दौर में कम प्रभावशाली साबित होता है।
संगीत और पृष्ठभूमि स्कोर भी कहानी के अनुरूप नहीं लगते, जिससे पूरे वातावरण में निरंतरता की कमी महसूस होती है। कुल मिलाकर, ‘उयिर’ एक ऐसे अवसर को खो देती है जो एक असली कहानी के जरिए दर्शकों के दिलों को छू सकती थी। यदि कहानी के केंद्र में अधिक संवेदनशीलता, ताज़गी और सशक्त निर्देशन होता, तो यह फिल्म अवश्य प्रभावशाली बनती।
फिलहाल, ‘उयिर’ को एक सामान्य पुलिस प्रक्रिया के रूप में देखा जा सकता है, जो पुराने तरीकों और धीमी प्रस्तुति के कारण मौजूदा समय के दर्शकों के लिए आकर्षक नहीं बन पाई है।

