कोलकाता में मानसून के आगमन के साथ ही न केवल शहर की गलियों में ठंडी ठंडी बारिश के बूंदें गिरीं, बल्कि शहरवासियों के दिलों में वे संगीत, फिल्में और यादें भी ताज़ा हो उठीं जो बरसात के मौसम से जुड़ी हैं। Fossils के गीतों की गूँज, खिचड़ी के प्याले की गर्माहट, शादी की शीशनों की सुमधुर तान और अपुर्ल संसर के किसी दृश्य का जादू—यह सब कोलकाता की बरसाती साउंडट्रैक के हिस्से हैं।
बारिश में Fossils के गीत सुनना कई कोलकातान के लिए एक पुरानी परंपरा है। उनकी ग़ज़लें, जो शहर के मानसून की मैले रंगतों के साथ मेल खाती हैं, प्रत्येक वर्ष बरसात के साथ लौट आती हैं। वहीं, खिचड़ी की भुनी भुनी खुशबू और गर्म गर्म खिचड़ी के स्वाद के बारे में तो कोलकाता के हर घर में चर्चा होती है। यह भोजन न सिर्फ शरीर को पोषण देता है, बल्कि मानसून की सर्द और ओंगी घटाओं में अनोखा संतोष भी देता है।
शादी के मौके पर बजने वाली शीशियों की तानें भी मानसून की यादों में गूँजती हैं। फिसलते हुए बारिश की बूंदों के नीचे बजती शादी की पार्टी की शीशनी वह पल होते हैं जो कोलकातान के मानसून को विशिष्ट बनाते हैं। इसके अलावा, सतीश लाहिड़ी की कालजयी फिल्म ‘अपुर्ल संसर’ के कुछ दृश्य बारिश के माहौल में देखने का अलग ही आनंद है। शहर के लोग इस फिल्म को मानसून की यादों से जोड़कर देखते हैं, क्योंकि वह फिल्म कोलकाता के सांस्कृतिक और मानसूनी परिवेश को बखूबी दर्शाती है।
मानसून के लौटने के साथ, कोलकाता के लोगों के दिलों में प्रेम, हानि, संगीत और फिल्मों से जुड़ी वह क्षणिक यादें फिर से जीवित हो उठती हैं। बारिश की बूंदों के साथ उनका पुराना संगीत मन गुलजार हो उठता है और शहर एक बार फिर अपने रंगीन और भावनात्मक स्वभाव को प्रकट करता है। जैसे-जैसे बूंदें गिरती हैं, वैसे-वैसे लोगों के मन के तार झंकृत होते हैं, और एक समुदाय के रूप में उनकी सांस्कृतिक धरोहर भी मजबूत होती है।
यह मानसून न केवल मौसम का एक बदलाव है, बल्कि कोलकाता की आत्मा को गहराई से छूने वाला एक अनुभव भी है। संगीत, फिल्मों, पारंपरिक व्यंजनों और बीती यादों के इस संगम से कोलकाता का मानसून संगीतमय, पाक-संस्कृति और भावनात्मक रूप से समृद्ध होता है। लोगों की यह साझा यादें और अनुभव शहर की पहचान को और भी मजबूत करते हैं, जिससे हर वर्ष बरसात का मौसम एक उत्सव की तरह मनाया जाता है।

