पवन खेड़ा की अग्रिम जमानत पर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा, दोनों पक्षों में तीव्र बहस

Rashtrabaan

    कांग्रेस नेता पवन खेड़ा की अग्रिम जमानत याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई हुई, जिसमें अदालत ने सभी दलीलों को सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया। इस मामले में खेड़ा की ओर से गिरफ्तारी से राहत की मांग की गई, जबकि असम सरकार ने इसे गंभीर आपराधिक मामला बताते हुए हिरासत में पूछताछ की जरूरत पर जोर दिया।

    सुप्रीम कोर्ट में चले बहस में दोनों पक्षों ने राजनीतिक बयानों और सार्वजनिक टिप्पणियों को लेकर अपने-अपने तर्क प्रस्तुत किए। असम सरकार ने इस मामले में आरोप लगाया कि पवन खेड़ा द्वारा किए गए कुछ बयान संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों के खिलाफ थे, जो मानहानि के दायरे में आते हैं। वहीं, बचाव पक्ष ने कहा कि राजनीतिक बयानबाजी को आपराधिक मामला बनाना गलत है क्योंकि यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लंघन है।

    अदालत ने फैसला सुरक्षित रखा

    सुप्रीम कोर्ट की पीठ जिसमें न्यायमूर्ति जे. के. माहेश्वरी और न्यायमूर्ति ए. एस. चंदूरकर शामिल थे, ने लंबी बहस के बाद कहा कि सभी पक्षों की दलीलों पर विस्तार से विचार किया जाएगा। इस सुनवाई के बाद फिलहाल निर्णय सुरक्षित रखा गया है। कोर्ट के इस निर्णय के बाद सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि अदालत अग्रिम जमानत को मंजूरी देती है या जांच एजेंसियों के पक्ष में कठोर रुख अपनाती है।

    हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती

    पवन खेड़ा की ओर से वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती देते हुए कहा कि उसमें गंभीर कानूनी त्रुटियां हैं। उन्होंने बताया कि आदेश में धारा 339 का उल्लेख किया गया है, जबकि यह न तो एफआईआर का हिस्सा है और न ही पुलिस शिकायत में शामिल है। सिंघवी ने कहा कि यह धारा जमानती अपराध से संबंधित है और इसकी वजह से गिरफ्तारी आवश्यक नहीं बनती। वे अदालत को यह भी समझाना चाहते थे कि न्यायिक आदेश में यह जोड़ मनमानी व्याख्या जैसा है।

    अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि यदि ऐसे मामलों में अग्रिम जमानत का लाभ नहीं दिया जाएगा, तो एंटीसिपेटरी बेल का उद्देश पूरी तरह खत्म हो जाएगा। उन्होंने जोर दिया कि किसी भी व्यक्ति को अनुमान के आधार पर हिरासत में नहीं लिया जाना चाहिए, खासकर जब आरोप जमानती प्रकृति के हों। सिंघवी ने यह भी बताया कि खेड़ा के फरार होने की कोई संभावना नहीं है और वे जांच में पूरा सहयोग करने को तैयार हैं।

    असम सरकार का सख्त विरोध

    असम सरकार की ओर से प्रस्तुत सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अग्रिम जमानत का कड़ा विरोध किया। उन्होंने कहा कि जांच में मिल रही जानकारी के अनुसार, कथित रूप से जाली और संदिग्ध दस्तावेजों का उपयोग हुआ है जिनकी सत्यता पर गंभीर सवाल उठते हैं। मेहता ने कहा कि यह जांच महत्वपूर्ण है कि ये दस्तावेज कहां से आए, इन्हें किसने उपलब्ध कराया और इनका उद्देश्य क्या था। उन्होंने यह भी दावा किया कि मामला केवल मानहानि तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे व्यापक साजिश की संभावना भी जांच के दायरे में है।

    सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों के तर्क बेहद गंभीर और विस्तृत रहे, जिससे यह मामला न्यायपालिका के सामने एक संवेदनशील मुद्दा बनकर उभरा है। इस पर आगामी फैसला राजनीतिक और कानूनी दोनों दृष्टिकोण से देश के लिए महत्वपूर्ण होगा।

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