कोझिकोड जिले में 2008 में शुरू की गई जनमैत्री परियोजना के अधिकारी अब यह खुलासा कर रहे हैं कि इस योजना के लिए सरकार की अपर्याप्त वित्तीय सहायता के कारण कई क्षेत्रीय गतिविधियां गंभीर रूप से प्रभावित हुई हैं। विशेष रूप से, अकेले रहने वाले बुजुर्गों की सुरक्षा और देखभाल में भारी कमी आई है, जो कि इस योजना की सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों में से एक थी।
जनमैत्री नेटवर्क की स्थापना का मूल उद्देश्य बुजुर्गों की सुरक्षा और उनके सामाजिक संरक्षण को सुनिश्चित करना था। लेकिन आने वाले वर्षों में वित्तीय संसाधनों की कमी और स्थानीय स्तर पर समुचित समर्थन न मिलने की वजह से इसका क्रियान्वयन कमजोर पड़ता गया। परियोजना में शामिल अधिकारियों का कहना है कि घर से बाहर निकलने में भी बुजुर्गों को खतरा होने लगा है क्योंकि नियमित निगरानी और सहायता की पहुँच सीमित हो गई है।
कोझिकोड के कुछ स्थानीय निवासी और सामाजिक कार्यकर्ता भी इस समस्या को लेकर चिंता जता चुके हैं। उनका मानना है कि वृद्धों की सुरक्षा हेतु आवश्यक कदम न उठाए जाने से समाज में असुरक्षा की भावना उत्पन्न हो रही है। अकेले रहने वाले बुजुर्गों की दैनिक जरूरतों और चिकित्सकीय सहायता का प्रबंधन भी इस कमी का शिकार हो रहा है।
सरकारी अधिकारियों ने स्वीकार किया है कि जनमैत्री योजना को पर्याप्त बजट नहीं मिल पा रहा है और यह स्थिति धीरे-धीरे परियोजना के प्रभाव को कम कर रही है। कई गतिविधियां जिन्हें समय-समय पर आयोजित किया जाना था, वह अब संभव नहीं हो पा रही हैं, जैसे कि घर-घर जाकर बुजुर्गों की जाँच, स्वास्थ्य शिविर एवं सामाजिक मिलाप।
समाज में बुजुर्गों की सुरक्षा और सम्मान के लिए आवश्यक है कि सरकार इस योजना को पुनः प्राथमिकता देते हुए वित्तीय सहायता बढ़ाए और स्थानीय कार्यान्वयन सद्भावना को मजबूत करे। इसके साथ ही जनमैत्री जैसे प्रोजेक्ट को सशक्त बनाने के लिए सामुदायिक सहभागिता एवं जागरूकता अभियानों को भी पुनर्जीवित करना होगा।
अंततः, बुजुर्गों की देखभाल में उपेक्षा न केवल उनकी सुरक्षा खतरे में डालती है, बल्कि सामाजिक संरचना को भी प्रभावित करती है। केरल जैसे प्रगतिशील राज्य में ऐसे चिंताजनक संकेत सरकार और समाज दोनों के लिए सतर्कता का कारण होना चाहिए ताकि हर नागरिक को सम्मानित और सुरक्षित जीवन दिया जा सके।

