देश के जैव विविधता संरक्षण में नया अध्याय जुड़ गया है। जीववैज्ञानिक सर्वेक्षण संगठन (Zoological Survey of India) और प्रोफेसर रामकृष्ण मोरे कॉलेज के वैज्ञानिकों ने भारतीय प्रायद्वीप के तिलचट्टों की पहली और सबसे बड़ी डीएनए बारकोड संदर्भ पुस्तकालय विकसित की है। यह अध्ययन तिलचट्टों के प्रजातिगत अध्ययन व संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
तिलचट्टों को अक्सर नकारात्मक रूप में देखा जाता है, लेकिन प्रकृति में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण और अनदेखी रही है। यह शोध न केवल तिलचट्टों की विविधता को समझने में मदद करेगा, बल्कि उनकी प्रजातियों की पहचान में भी सहायक सिद्ध होगा। शोधकर्ताओं ने बताते हुए कहा कि भारत में कुल मिलाकर 191 विभिन्न तिलचट्टे की प्रजातियाँ पाई जाती हैं, जिनमें से लगभग 60 प्रतिशत प्रजातियाँ केवल भारत में ही मिलती हैं, यानी वे स्थानीय (एंडेमिक) हैं।
यह डीएनए बारकोड संदर्भ पुस्तकालय वैज्ञानिक समुदाय को जीवों की पहचान में तेजी और सटीकता प्रदान करेगा तथा जैव विविधता संरक्षण योजनाओं को भी मजबूती देगा। इससे संबंधित प्रयोगशालाओं और शोधकर्ताओं को तिलचट्टों की अध्ययन सामग्री तक आसान और प्रमाणित पहुंच मिलेगी।
प्रो। रामकृष्ण मोरे कॉलेज के वरिष्ठ जीवविज्ञानी ने बताया कि इस परियोजना में जैव विविधता के विभिन्न पहलुओं को ध्यान में रखते हुए डेटा संग्रहण और विश्लेषण किया गया है। इतना बड़ा डीएनए बारकोड संग्रह उपलब्ध होने से भविष्य में कीट विज्ञान और पारिस्थितिकी के क्षेत्र में अनुसंधान को गति मिलेगी। यह पुस्तकालय भारतीय उपमहाद्वीप के लिए खास वैज्ञानिक संसाधन के तौर पर गर्व का विषय है।
जैविक संरक्षण के क्षेत्र में यह एक महत्वूर्ण कदम माना जा रहा है, क्योंकि तिलचट्टों की प्रजातिगत पहचान और उनका वितरण समझना जैव विविधता के संरक्षण में आवश्यक है। इस अध्ययन से न केवल तिलचट्टों की विविधता का पता चलेगा बल्कि संभावित खतरनाक प्रजातियों के नियंत्रण में भी सहायता मिलेगी।
इसके अलावा, यह शोध पर्यावरणीय संतुलन और पारिस्थितिकी तंत्र की स्थिरता के लिए भी एक आधारशिला सिद्ध होगा। विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में पाए जाने वाले इन तिलचट्टों की डीएनए आधारित पहचान से न केवल देश बल्कि वैश्विक स्तर पर भी कीट वैज्ञानिकों का काम आसान होगा।
इस प्रकार ये वैज्ञानिक प्रयास भारत के जैव विविधता संरक्षण और अनुसंधान को एक नई दिशा देने में मददगार साबित होंगे। इसके अलावा, स्कूली और कॉलेज स्तर पर पर्यावरणीय शिक्षा को भी इस तरह के शोध से मजबूती मिलेगी।

